पुलवामा, आतंकवाद के खिलाफ लड़ी गयी जंग, और नफरत की राजनीति – २

https://humanitycollege.org/2019/03/11/pulwama-and-the-war-on-terror-part-1/ — इस आर्टिकल के बाद दूसरा नंबर।

हमारा बदला पूरा हो जाए तो मैं कुछ सवाल आप सबसे पूछना चाहूंगा। मुझे उम्मीद है आप सब मुझे वो मौका देंगे।

मैं जिन बातों को आपके सामने लाना चाहता हूँ, वो इस प्रकार है:

प्रश्न 1 – जहाँ हर वक्त इतनी कड़ी सुरक्षा व्यवस्था होती हैं, जहाँ एक परिंदा भी पर नहीं मार सकती, उस मैक्सिमम सेक्युयरिटी ज़ोन में आतंकवादी बम से भरा हुआ ट्रक लेकर आते हैं और धमाका करके अत्याधुनिक हथियारों से लैस हमारे ४० से ज़्यादा सैनिकों को मार डालते हैं। पर कैसे? सवाल यह है जहाँ कुछएक किलोमीटर के दायरे पे और भी सेना छावनियां है, वहां ३०० किलो आईइडी लेकर जैश के आंकवादी उस संवेदनशील छेत्र में घुसे कैसे? क्या इसकी कोई निष्पक्ष जांच होगी? इस भयानक मौत के लिए कौन जिम्मेदार है? इन बेकसूर सैनिकों के नरसंहार के लिए जो भी जिम्मेदार है, क्या उसकी पहचान की जाएगी?

प्रश्न 2 – क्या अब तक किसी जनरल, कर्नल, मंत्री या सुरक्षा अधिकारी इस लापरवाही के लिए खुद को दोषी मानते हुए इस्तीफा दिया है? नहीं ना। हांलाकि, हम जानते है अगर बैंक में कभी डाका पड़ जाये और वहां की तिजोरी लूट ली जाये तो वहां के शाखा प्रबंधक को इसका खामियाजा भुगतना पड़ता है, लापरवाही के लिए उनकी नौकरी भी जा सकती है। कॉर्पोरेट दुनिया में भी विफलता की जिम्मेदारी लेनी पड़ती है। और फिर हमारी सरकार तो अमेरिका के कॉर्पोरेट मॉडल पर ही चल रही है। फिर यहाँ उनका यह नियम लागू क्यों नहीं होगा?

प्रश्न 3 – सुनने में आया है की खुफिया विभाग को इस हमले की खबर पहले से थी। फिर भी, सुरक्षा विभाग से इतनी बड़ी खामी कैसे रह गई? क्या किसी ने इसे जानबूझकर, सुनिश्चित तरीके से होने दिया? अगर सच में ऐसा है तो वे कौन लोग है? क्या उन्हें ढूंढ निकलना इतना मुश्किल है?

प्रश्न 4 – चलिए मान लेते हैं भारतीय सेना और वायु सेना एकसाथ मिलकर पाकिस्तान में घुस कर उनके सभी आतंकवादी ठिकानों पर बम बरसाकर उन्हें नष्ट कर देती है, जो अंतर्राष्ट्रीय कानून के नज़रिए से देखा जाये तो गलत है। क्यूँकि कोई भी देश किसी दूसरे देश में अंतरार्ष्ट्रीय स्तर पर अनुमति के बगैर नहीं घुस सकता, एकतरफा बमबारी नहीं कर सकता और उसकी संप्रभुता को नष्ट नहीं कर सकता। ऐसा करना अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर असंवैधानिक और गैर कानूनी होगा। हालाँकि, पूरे विश्व के विरोध को नज़रअंदाज़ करके किसी दूसरे देश में बमबारी और नरसंहार कैसे किया जाये यह तो अमेरिका ने ही हमें सिखाया है। इसका सबसे बड़ा उदहारण है इराक, वियतनाम और सीरिया। फिर तो हम भी दो चार ऐसे छोटे -मोटे हमले कर ही सकते है। लेकिन सवाल ये उठता है की क्या केंद्र सरकार हमारे देश की भविष्य के सुरक्षा सुनिश्चित कर पायेगी? ऐसा कदम उठाने पर भविष्य में कोई दूसरा आतंकवादी हमला नहीं होने का आश्वासन क्या मोदी सरकार हमें दे पायेगी?

प्रश्न 5 – आज के इस दौर में जहाँ हम अपनी रोज़मर्रा के ज़िन्दगी में छोटी से छोटी चीज़ें भी बिना गारंटी के नहीं लेते, चाहे वो सिलाई मशीन हो या गाड़ी; वहीं हम बिना गारंटी के बमबारी और उसके पीछे होने वाले रुपये की बर्बादी को कैसे खरीदेंगे?

[Our second Hindi article on India-Pakistan terror, politics of hate and violence, and some important questions on the eve of national elections. Hope you read and share. This is part 2 of a long article I wrote. Moly Mukherjee Gupta from Southampton, U.K. translated into Hindi.]


(जारी। कृपया वापस आ जाओ।)

पुलवामा, और आतंकवाद के खिलाफ लड़ी गयी जंग – १

मान लीजिए, आतंकवाद के खिलाफ लड़ी गयी जंग में भारत को पाकिस्तान के आतंकवादी ठिकानों को तबाह करने में कामयाबी मिल जाती है।

फिर आगे क्या? क्या मैं कुछ सवाल आपसे पूछ सकता हूँ?

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मेरे दोस्त और मुझे जानने वाले लोग ही आज मुझे पाकिस्तानी और गद्दार कहके पुकार रहे हैं। वे मुझसे नाराज़ हैं। उनका कहना हैं की देश की इस कठिन परिस्थिति में मैं युद्ध के खिलाफ बात करके भारत के शत्रु की भांति आचरण कर रहा हूँ। उनका अपना ही आज उनके नज़रों में ‘’घर का भेदी’’ और ‘’दुश्मन’’ बन गया है। कल तक जो मेरे इतने करीब थे आज वे ही मुझे सबक सिखाने की बात करने लगे हैं।

गलती मेरी ही हैं। मैं विश्व में होने वाले समस्त घटनाओं के जानकार, सर्वज्ञानी तो हूँ नहीं, जिसे सब पता हो। फिर क्या ज़रुरत थी ऐसे मामलों में मुझे कुछ कहने की? आजकल तो राह चलते भी डरने लगा हूँ, न जाने कब किससे मार खा जाऊँ!

किसी भी परिस्थिति में मैं अपने आपको युद्ध-विरोधी ही पाता हूँ। इसके बावजूद, पाकिस्तान के साथ भारत के बिगड़ते रिश्ते में मैंने खुद को भाजपा की नीतियों के समर्थन में पाया। हांलांकि मैं पाकिस्तान के उन तमाम आतंकवादी ठिकानों में बम फेंके जाने के भाजपा के इस फैसले से पूरी तरह सहमत नहीं हूं, लेकिन केवल उनकी देशभक्ति का सम्मान करने के लिए मैंने अपनी युद्ध-विरोधी सोच को युद्ध-परस्त सोच में तब्दील कर दिया। चलिए आज इन दोनों देशों में एक युद्ध हो जाने देते हैं। उनके समस्त आतंकवादी ठिकानों पर ताबड़तोड़  बम बरसाकर उन्हें ध्वस्त कर डालते हैं जिससे जैश के साथ-साथ जितने भी दूसरे चरमपंथी संगठन हैं उन्हें कड़ा से कड़ा सबक मिल सके।

अपने पिछले लेख में मैंने पुलवामा हमले में अपने देश के शहीद सैनिकों को श्रद्धांजलि देते हुए उन पर हुए इस कायरतापूर्ण हमले कि कड़ी निंदा की थी। उससे पहले मैंने कभी खुद को इतना ज़्यादा दुःखी, लाचार और बेबस नहीं पाया था। उस लेख में अपनी इस भावना को मैं आपके साथ साझा कर चुका हूँ। अपने बहादुर जवानों कि शहादत को हम बेकार नहीं जाने देंगे। खून के बदले खून चाहिए। और उस नज़रिये से देखा जाये तो पाकिस्तान में बसे सभी आतंकी शिविरों को तबाह करने का नतीजा भी अच्छा ही होगा।

पार्थ बनर्जी.

ब्रुकलिन, न्यू यॉर्क

Translated by: Moly Mukherjee Gupta, Southampton, U.K.

ধরা যাক, সন্ত্রাসের বিরুদ্ধে যুদ্ধ হলো। পাকিস্তানে শত্রুকে গুঁড়িয়ে দিলাম আমরা। তারপর কী? কয়েকটা প্রশ্ন করা চলবে?

Can we condemn terror from Pakistan into India, and after supporting a bombing campaign inside Pakistan to destroy terrorist camps, ask some important questions — especially to those who call me anti-India traitor, or at least unpatriotic? Please answer my ten questions.


আমার বন্ধুরাই আমাকে পাকিস্তানী বলছে। দেশদ্রোহী বলছে। বলছে আমি নাকি দেশের এই সংকটে যুদ্ধের বিরুদ্ধে কথা বলে ভারতের শত্রুর মতো আচরণ করছি। আমি নাকি একজন “enemy within” বা ঘরের শত্রু। আমাদের মতো লোকদের আগে শায়েস্তা করা দরকার। 
তাই আমি ভেবে দেখলাম, আমি খুব অন্যায় করছি। এমন তো নয় যে আমি সবজান্তা, আর কেউ কিছু জানেনা। আমিই একমাত্র ইতিহাস পড়েছি, আর কেউ পড়েনি। আমিই একমাত্র খাঁটি দেশপ্রেমিক, আর সবাই ইডিয়েট। তাছাড়া, ভয়ও আছে, কে কোথায় রাস্তায় ধরে ধোলাই দেবে। কী দরকার?

তারপর ধরুন, প্রত্যেকের প্রতিই আমার শ্রদ্ধা আছে। আমি সম্মান দিতে জানি মানুষকে। সুতরাং, যুদ্ধের পক্ষে, পাকিস্তানের ভিতরে ঢুকে বোমা ফেলার বিজেপি সিদ্ধান্তের স্বপক্ষে আমি সম্পূর্ণ সহমত না হলেও, শুধুমাত্র তাদের দেশপ্রেমকে সম্মান জানানোর জন্যে — ধরা যাক, আমি আমার যুদ্ধবিরোধী অবস্থান আজকের জন্যে পরিবর্তন করলাম। হোক যুদ্ধ, হোক বোমাবর্ষণ। সন্ত্রাসীদের ঘাঁটিগুলো ভেঙে গুঁড়িয়ে দাও। জৈশ আর যারা যারা আছে, উড়িয়ে দাও তাদের সব কটাকে। 

পুলওয়ামার শহীদ সেনাদের জন্যে আমার যে কৃতজ্ঞতা, তা আমি আগেও লিখেছি। তাদের মৃত্যু যেন ব্যর্থ না হয়। রক্তের বদলে রক্ত চাই। ধরা যাক, ভালোই হবে। 

এসব প্রতিশোধ নেওয়া হয়ে গেলে, তারপরে আমি কতগুলো প্রশ্ন করতে পারি কি? আশাকরি, আমার ওই বন্ধুরা আমাকে সে সুযোগ দেবে। 

যদি দেয়, তাহলে আমি এই কথাগুলো বলবো। 

ওরা যদি উত্তর না দেয়, আপনারা দিন। বা, আমার থেকে যারা অনেক বেশি জানে, তাদের বলুন উত্তর দিতে। 

হাজার হোক, আমি সামান্য মানুষ। কীই বা জানি এসব বিশাল বিশাল ব্যাপারের?___________________________

প্রশ্ন ১ — ম্যাক্সিমাম সিকিউরিটি জোন, যেখানে মাছি গলেনা, সেখানে সন্ত্রাসীরা ট্রাক বোমা নিয়ে এসে পঁয়তাল্লিশ জন অস্ত্রধারী, ট্রেনিং নেওয়া সৈনিককে উড়িয়ে দিলো কী করে? তার কোনো নিরপেক্ষ তদন্ত হবে কি? কে দায়ী এই ভয়াবহ মৃত্যুর জন্যে, এই সৈনিকদের গণহত্যার জন্যে, তার সনাক্তকরণ হবে কি? 

প্রশ্ন ২ — এখনো পর্যন্ত এই বিশাল নিরাপত্তা গাফিলতির জন্যে কোনো জেনারেল, কর্ণেল, মন্ত্রী বা নিরাপত্তা অফিসার পদত্যাগ করেছে কি? কোনো ব্যাংকের ভল্টে  যদি ডাকাতি হয়, নিরাপত্তার দায়িত্বে থাকা অফিসার বা ব্যাংক ম্যানেজার যার কাছে সিকিউরিটির চাবিকাঠি থাকে, তার চাকরি যায়। কারণ তারা ডাকাতি বন্ধ করতে ব্যর্থ হয়েছে। ব্যর্থতার দায়িত্ব কর্পোরেট জগতে নিতেই হয়। আর এখন তো সরকার চলছে কর্পোরেট আমেরিকার মডেলে। তাহলে, এখানে তা হবেনা কেন? 

প্রশ্ন ৩ — শুনেছি, আগেই নাকি খবর এসেছিলো, সন্ত্রাসী হামলা হতে চলেছে। তারপরেও নিরাপত্তায় এতো বড় গর্ত থেকে গেলো কীভাবে? কেউ বা কারা কি ইচ্ছাকৃতভাবে এই সন্ত্রাস যাতে হয়, তা সুনিশ্চিত করেছে? তারা কারা? তাদের খুঁজে বের করা কি এতই অসম্ভব?

প্রশ্ন ৪ — আচ্ছা, ধরা যাক, ভারতের মিলিটারি ও এয়ার ফোর্স পাকিস্তানে ঢুকে জঙ্গি ঘাঁটি গুঁড়িয়ে দিলো। যদিও, আন্তর্জাতিক আইন বলেছে, একতরফাভাবে কোনো দেশের সীমারেখার মধ্যে ঢুকে বোমাবর্ষণ করা — কোনো আন্তর্জাতিক আলোচনা ছাড়াই — সে দেশের সার্বভৌমত্ব (sovereignty) ধ্বংস করে, যা আন্তর্জাতিক আইনবিরুদ্ধ কাজ। যাই হোক, আমেরিকা আমাদের শিখিয়েছে, কীভাবে সারা পৃথিবীর বিরোধিতার তোয়াক্কা না করে একতরফাভাবে যুদ্ধ, বোমাবর্ষণ ও গণহত্যা করা যায়। ইরাক, ভিয়েতনাম, এখন সিরিয়া। সুতরাং, নিশ্চয়ই করা যায়। ধরে নিলাম। তাহলে, মোদী ও তাঁরা সরকার আমাদের দেশের ভবিষ্যৎ নিরাপত্তা নিশ্চিত করতে পারবে কি? তারা কি গ্যারান্টি দেবে, আর কখনো এ ধরণের সন্ত্রাসী হামলা হবেনা?

প্রশ্ন ৫ — গ্যারান্টি ছাড়া একটা গাড়িও যখন আমরা কিনিনা, এমনকি একটা সেলাই মেশিন, তাহলে গ্যারান্টি ছাড়া আমরা যুদ্ধ ও বোমাবর্ষণ ও তার পিছনে যে বিশাল অংকের অর্থব্যয়, তা কিনবো কী করে? এই কর্পোরেট সিস্টেমে নির্বাচন তো এখন বৃহত্তম মল, সুপারমার্কেট। 

প্রশ্ন ৬ — এই যুদ্ধের পরে কি কাশ্মীর সমস্যার স্থায়ী কোনো সমাধান খুঁজে বের করা হবে? আমেরিকা ও সৌদি আরব জাতীয় দেশগুলো — যারা পাকিস্তানকে চিরকাল অস্ত্র ও অর্থসাহায্য করে এসেছে, এবং আজকেও করছে (সৌদি ক্রাউন প্রিন্স গত সপ্তাহেই পাকিস্তানে ও ভারতে ভ্রমণ করেছেন, এবং বিশাল অর্থসাহায্যের প্রতিশ্রুতি দিয়েছেন পাকিস্তানকে) — তাদের কি এই সমাধান আলোচনায় সামিল করা হবে? কারণ, কাশ্মীরের এই জটিলতা এবারে একেবারেই শেষ করা দরকার। 

প্রশ্ন ৭ — পাকিস্তানকে সম্পূর্ণ ধ্বংস করে দিলে কি সন্ত্রাস ও কাশ্মীর সমস্যার স্থায়ী সমাধান হবে? ধরা যাক, বিজেপি ও আর এস এস তো চিরকালই চেয়ে এসেছে পাকিস্তানের ধ্বংস। যদি তর্কের খাতিরে ধরে নিই, আমরা পাকিস্তানকে ধ্বংস করে দিলাম একেবারে। তাহলে কি পাকিস্তানী শিশু এবং কয়েক কোটি মানুষের সীমান্ত পার হয়ে ভারতে আসা বন্ধ হবে? তাদের প্রতিহিংসার ও প্রতিশোধের আগুন কি নিভে যাবে? অন্য দেশের সন্ত্রাসীরা কি তখন আরো বেশি করে ভারতের ওপর নানাভাবে সাবোটাজ ও সন্ত্রাসী হামলা চালাবে না? তার গ্যারান্টি কি মোদী ও আর এস এস সরকার দিতে পারবে?

প্রশ্ন ৮ — এই সমস্ত যুদ্ধ ও সন্ত্রাস দমনের কাজ শেষ হলে ভারতের অর্থনৈতিক সংকট, দুর্নীতি, জনবিস্ফোরণ, পরিবেশ ও জলবায়ু সংকট, ভয়াবহ কৃষি ও বেকার সমস্যা, রাফায়েল চক্রান্ত, নীরব মোদী-বিজয় মাল্য-আম্বানি জাতীয় অতি বিশাল মাপের দুর্নীতি ও স্ক্যাণ্ডাল মোদী সরকার কি মোকাবিলা করবে অনতিবিলম্বে? 

প্রশ্ন ৯ — যুদ্ধ ও সন্ত্রাস দমন হয়ে গেলে মোদী ও বিজেপি সরকার কি সরকারি ব্যাঙ্ক, শিল্প, ইন্স্যুরেন্স, শিক্ষা, স্বাস্থ্য এবং পরিবহন — এসব সেক্টরকে সম্পূর্ণ বেসরকারিকরণ করে ফেলবে? এক ডলারে এখন ৭২ টাকা। এবারে কি তা আই এম এফ ও বিশ্ব ব্যাংকের নির্দেশে ৮০ বা ৮৫ টাকা হয়ে যাবে? জিনিসপত্রের দাম, তেলের দাম, পরিবহণ, মেডিকেল, শিক্ষা — এসবের খরচ কি আরো অনেক বেড়ে যাবে? 

প্রশ্ন ১০ — এবারের নির্বাচনে জয়লাভ করলে মোদী ও বিজেপি এবং আর এস এস কি ভারতের সংবিধানকে সম্পূর্ণভাবে বদলে ফেলবে, যাতে রাজনৈতিক বিরোধিতাকে প্রকাশ্যেই দেশদ্রোহিতা বলে ঘোষণা করা যায়, এবং রাজনৈতিক বিরোধীদের দেশদ্রোহিতার দোষে সাংবিধানিকভাবে শাস্তি দেওয়া যায়?

উত্তরের অপেক্ষায় থাকবো। আপনাদের সকলকে উত্তর খুঁজে বের করার জন্যে প্রেরণা, উদ্দীপনা ও উৎসাহ দিতে থাকবো। 

ভারত মাতা কি জয়। জয় হিন্দ। বন্দে মাতরম। 
_________________
ব্রুকলিন, নিউ ইয়র্ক 
২৬শে ফেব্রুয়ারি, ২০১৯ 

একজন প্রাক্তন আর এস এস এক্টিভিস্ট হিসেবে বিজেপি বন্ধুদের কাছে কিছু প্রশ্ন

 
— পর্ব ১ —
_______________________

অবশ্য আমার কথাগুলো বলছি যারা উত্তর দিতে চায়, তাদের কাছে। যারা কিছু পড়বেনা, ভাববেনা, আর খুন জখম হ্যাকিং ট্রোলিং রক্ত চাই এসব রাস্তায় যাবে, তাদের কাছে নয়।

আমি মনে করিনা, আর এস এস অথবা বিজেপি মানেই “রক্ত চাই”এর দল। আমি তাদের সেন্টিমেন্ট বুঝি। অন্ততঃ, দেশপ্রেম যে তাদেরও আছে, তা বুঝি। আশা করবো তারাও বুঝবে আমিও একজন দেশপ্রেমিক। এবং আমার মতো অনেকেই যারা পুলওয়ামা নিয়ে যুদ্ধ ও রক্ত চাইয়ের বিরুদ্ধে কথা বলছে, তারাও দেশপ্রেমিক।

কেউ দেশদ্রোহী নই আমরা। দেশের প্রতি, দেশের মানুষদের প্রতি, ঐতিহ্য ও ইতিহাসের প্রতি আমাদের গভীর শ্রদ্ধা আছে। আমি নিজেকে একজন হিন্দু বলেই মনে করি। আমি ধর্ম ও অধ্যাত্ম মানি। কিন্তু ধর্মের নামে ধর্মান্ধতা, ঘৃণা ও গোঁড়া রক্ষণশীলতার বিরোধী। দেশ ছেড়ে এসে অন্য দেশে থাকলেই বিদেশী হয়ে যায়না। সংঘ পরিবারের হাজার হাজার সদস্য ও সমর্থক আমেরিকা ও ইউরোপে থাকে। তারা কি সবাই বিদেশী?

আমি ইসলামিক সন্ত্রাসকে সন্ত্রাস বলি। সভ্যতার শত্রু বলে চিহ্নিত করি। আমি কম্যুনিজমকে সমর্থন করিনা। আমি কংগ্রেসি রাজনীতিকে চিরকাল ঘৃণা করে এসেছি। অথচ, কংগ্রেসের মধ্যেও আমার বহু কাছের মানুষ ছিল ও আছে। সেরকম বামপন্থী দলগুলোর মধ্যেও আমার খুব কাছের মানুষদের আমি দেখেছি সারাজীবন। তাদের ত্যাগ ও দেশপ্রেমকে আমি শ্রদ্ধা করে এসেছি সারাজীবন।

আমার অনেক বিজেপি ও আর এস এস বন্ধু আছে। তাদের অনেককে আমি চল্লিশ বছর, এমনকি পঞ্চাশ বছর ধরে চিনি। আমি যখন ছ বছর বয়েসের শিশু, তখন ওই শিশু স্বয়মসেবক হিসেবে আর এস এসে ঢুকেছিলাম স্বর্গীয় পিতৃদেব শ্রী জিতেন্দ্রনাথ বন্দ্যোপাধ্যায়ের হাত ধরে। জিতেন্দ্রনাথ ছিলেন সংঘ প্রচারক, এবং অটলবিহারী, আদভানির আজীবন বন্ধু। হিন্দুত্ববাদী নাথুরাম গডসে সাভারকার ইত্যাদি নেতাদের সাহায্যে গান্ধীহত্যা করার পরে যখন আর এস এস নিষিদ্ধ হয়, তখন আমার বাবা তিন বছরের মতো জেলে ছিলেন।

এই জেলে থাকার কারণে বাবা কখনো সরকারি চাকরি পাননি, এবং আমাদের সারাজীবন দারিদ্র্যের মধ্যে কাটাতে হয়েছে। আমার মা নিজে না খেয়ে তার খাবারটা আমাদের অনেক সময়ে দিয়ে দিতো। এবং, খুব কম বয়েসে ক্যানসারে মারা যায়। যাক, সেসব অন্য কথা। অন্য প্রসঙ্গ।

আমাদের বাড়িতে আর এস এসের বিরাট বিরাট সর্বভারতীয় নেতারা আসতেন।ভাউরাও দেওরাস, নানাজী দেশমুখ, একনাথ রাণাডে — এমনকি গুরু গোলওয়ালকার — আমাকে ব্যক্তিগতভাবে চিনতেন, এবং স্নেহ করতেন।

আমি ছ বছর বয়েস থেকে বাইশ বছর বয়েস পর্যন্ত আর এস এস করেছি। শিশু স্বয়মসেবক থেকে বালক, তারপর তরুণ, তারপর শিক্ষক, মুখ্যশিক্ষক। তারপর জনসঙ্ঘ দলের হয়ে দিল্লি — জনতা পার্টি তৈরী হওয়ার প্রথম জাতীয় সম্মেলনে। আমাকে অখিল ভারতীয় বিদ্যার্থী পরিষদের (এবিভিপি) পশ্চিমবঙ্গ সম্পাদক করা হয়েছিল। আমার অনেক বন্ধু সেসব দিনের কথা জানে। তাদের অনেকে এখন ফেসবুকেও আছে।

অদ্ভুত কথা হলো, তারা তখন আমার জনসঙ্ঘ, আর এস এস, এবিভিপি করা দেখে হাসতো। এখন তারা অনেকে হিন্দুত্ববাদীদের গোঁড়া সমর্থক। আর আমি চিরকালের মতো গোঁড়া হিন্দুত্ববাদী রাজনীতি ছেড়ে বেরিয়ে এসেছি।

কেন বেরিয়ে এলাম? সে অনেক কথা। আদর্শগত কারণেই বেরিয়ে এসেছি। আমি ঘৃণা, হিংসা, যুদ্ধবাদ ও সাম্প্রদায়িকতার রাজনীতিতে বিশ্বাস করিনা। আমি আমার দুটো বই — ইংরিজি বই In the Belly of the Beast এবং বাংলা স্মৃতিকথা ঘটিকাহিনি’তে বিশদভাবে লিখেছি। পারলে পড়ে নেবেন।

ইংরিজি বইটা আউট অফ প্রিন্ট, কিন্তু কিছু কিছু অংশ পাওয়া যায় অনলাইনে। ঘটিকাহিনি সবে দুবছর আগে বেরিয়েছে। দেজ পাবলিশিং, ধ্যানবিন্দু, এবং প্রকাশক রাবণ প্রকাশনাতে পেয়ে যাবেন।

পড়ুন। প্রশ্ন করুন। চ্যালেঞ্জ করুন আমাকে।

(পর্ব ২ লিখবো। আশা করি আপনাদের জানার উৎসাহ থাকবে।)

Old RSS: Anti-Gandhi, Anti-Tagore. New BJP: Corrupt, Violent, and Dangerous.

RSS and BJP, India’s Hindu fundamentalist organizations, have transformed for old day’s racist but dedicated and naive to racist and corrupt and violent. They will destroy India and its social and economic fabric.

RSS Kolkata

This is what I have seen in my long, personal association, and study, of India’s Hindu chauvinist forces. RSS — the mentor, umbrella organization. BJP — its political wing now in the seat of power. ABVP, VHP, etc. — other powerful RSS outfits.

Pratik Ghosh translated the following from my Bengali article I posted in Facebook.

I have always found RSS, BJP and ABVP supporters to be of lower aptitude. Not much to talk home about their knowledge, thinking ability or analytical skills. They can be aptly called headstrong.

Like, my father used to say, they were not just anti-Gandhi but also anti-Tagore. My father despite having a golden opportunity refused to meet Rabindranath Tagore in Benaras. Now he regrets. What can be done regretting now – it is too late. At his young age, my father was just like that. In the fifties he moved to Kolkata and started reading Tagore.

But his Tagore was confined to Shivaji Utsab (Celebrating Shivaji – a Maratha icon), Bandi Vir (An Imprisoned Hero – a Sikh guru) and songs from the poet’s Devotion and Patriotic bouquets. Like the way hardliner Muslims from Bangladesh and Pakistan abuse Tagore without reading his works. They haven’t read Tagore’s Wife’s Letter, The Laboratory, The Crisis of the Civilization, or The Petrified Place. They have not heard his speeches, read his essays, letters, or his missive from Russia. They know a tiny sliver, a fragmented Tagore. And with that utterly limited knowledge they judge the Master Poet.

Yet during my intense association of some sixteen years with RSS-Jan Sangh-BJP-ABVP I always noticed that despite not being very clever, they were genuine human beings. I saw my father Jitendranath. How selflessly he spent his entire life with the Sangh family! In return he asked for nothing. Had he asked, he could have gotten a lot. Since 1939 he had been with national RSS/BJP leaders like Advani and Vajpayee. He too was jailed at the aftermath of assassination of Gandhi [when a Hindu zealot Nathuram Godse killed Gandhi, and the organization was banned]. Subsequently, being on the Congress blacklist he couldn’t get a proper job and spent his life in poverty.

I have written about these in my Bengali memoir, “Ghoti-kahini”. I have seen with amazement how for years the RSS proselytizers worked half fed from their third floor office at 26 Bidhan Sarani. They were racists, anti-Islam, anti-Christian. They depicted a laughable history of India. They knew hardly anything about the world history. They were awfully anti-socialism. Yet, they were nice guys. Like affectionate elder brothers. Even after I left RSS, I could never forget these men.

But now I see with the smell of power, BJP is filled with evil degraded men. Blood in their eyes. Poison at their tongues. Killing machines at their hands. I feel sad seeing them because they haven’t seen people like my father. They haven’t seen how to sacrifice life at the altar of idealism.

I have also seen at the other end how for the sake of idealism the followers of Communist Party of India (Marxist) or Marxism sacrificing their lives. I remember how my CPIM following in-laws’ family didn’t get on with my father. There was never any political discussions between them but there was a mutual respect. The Bengali characteristic of respect, civility, modesty and love is no longer found among the BJP supporters in Bengal. A few good ones keep shut for the fear of the obscene mayhem the rest can unleash upon them. They don’t have the backbones to withstand it.

I have been in politics for long. Politics of getting thrashed on the road. Politics of putting my own life at risk. I have done that in India. In the U.S. as well. Those who know me, know it. Those who don’t, can check it out on my Wikipedia page. The perpetrators of these atrocities are that foolish that they don’t even realize that they are only revealing their true self to the society. People with brains know that civility, gentleness are humane quality. Possessors of a sub-human brain have no understanding of that. Ironically, those without a brain, don’t realize that they don’t have brains because they need brains to understand it.

Anyway, there is no place for communal violence and slander in Bengal. Not for the Hindus. Not for the Muslims. Neither for CPIM, nor for the Trinamool Congress, now in power of West Bengal. And I shall carry on with my mission. My mission of making people think differently. To teach how to think. I am trying to steer away people from the brainwashing by the media. Steering my students in the US, people in India, in Bengal.

I have always been by the side of the oppressed. By the side of women, men, and children. I will always write against injustice, dishonesty, corruption and thuggery. I will protest — BJP or whoever the perpetrators might be.

Violence, intimidation, coercion or dirty abuses cannot bottle me up.

Sincerely,

Partha Banerjee

Brooklyn, New York

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From: Indian Express.