এগারোই সেপ্টেম্বরের সেই দিনটার কথা।

এগারোই সেপ্টেম্বরের সেই দিনটার কথা। নিউ ইয়র্কে নিজের জীবনের অভিজ্ঞতা। প্রকৃত সত্য।

নিউ ইয়র্কে নিজের জীবনের অভিজ্ঞতা।
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আমেরিকার জীবনের এক মর্মান্তিক অভিজ্ঞতার গল্প আপনাদের শোনাতে চাই। তার কারণ, দুহাজার এক সালের এগারোই সেপ্টেম্বর নিয়ে অনেক কিছু বলা হয়েছে, অনেক সিনেমা আর নাটক নভেল হয়েছে, আর বাঙালির ঘরে ঘরে বাঙালির বৈশিষ্ট্যমূলক গাঁজার আড্ডাও অনেক হয়েছে। কিন্তু প্রকৃত সত্য কতটা মানুষ জানতে পেরেছে, তা সন্দেহের বিষয়।

সেদিনটা ছিল মঙ্গলবার। আমার মেয়ে ঠিক তার আগের সপ্তাহে নিউ ইয়র্কের পাবলিক স্কুলে ভর্তি হবার একটা পরীক্ষায় পাশ করে এখানকার স্টাইভেসান্ট হাই স্কুলে ভর্তি হয়েছে। এই পরীক্ষায় পাশ ছিল আমাদের মতো সাধারণ মানুষদের কাছে মরণবাঁচন।

আমি তখন কাজ করি নিউ জার্সিতে, আমাদের ব্রুকলিন থেকে আড়াই ঘন্টা ড্রাইভ করে। নটার সময়ে অফিস পৌঁছোনোর একটু পরেই খবর পেলাম। প্রথমে কেউ ভালো বুঝতে পারেনি। কিন্তু তারপর, আসল খবর টিভিতে আসতে আরম্ভ করলো। টুইন টাওয়ারের একটা টাওয়ার তখন ভেঙে পড়েছে। মানুষ ভয়ে দিশেহারা।

হঠাৎ মনে হলো, আচ্ছা, আমাদের মেয়েটা এখন কোথায়? স্টাইভেসান্ট হাই স্কুল তো ওয়ার্ল্ড ট্রেড সেন্টার থেকে ঢিলছোঁড়া দূরত্বে! এই ধরুণ, ক্যাথিড্রাল চার্চ থেকে রবীন্দ্র সদন।

যোগাযোগ বিচ্ছিন্ন। নটা থেকে দশটা, এগারোটা, … বাড়িতে স্ত্রীকে ফোন করলাম। সেও উদভ্রান্ত। কেউ কিছু বলতে পারছেনা। সেল ফোন কাজ করছেনা। ইতিমধ্যে দ্বিতীয় টাওয়ার ভেঙে পড়ে ধুলোর মতো গুঁড়িয়ে গেছে। টিভিতে দেখাচ্ছে বারবার।

আমার এক বন্ধুকে ম্যানহাটানে ইমেল করলাম। এবিসি টিভির অফিস। ওখানে কাজ করতাম আগে। “ভাই তুমি একটু খোঁজ নেবে কী ব্যাপার? মেয়েটার কোনো খবর পাচ্ছিনা।” জানতাম, ছেলেটা কিছু একটা করবে। ও খোঁজ করেওছিলো। কিন্তু সেখানে তখন যাওয়া অসম্ভব। আমাকে জানালো, “পার্থ, চিন্তা কোরোনা। সব ঠিক আছে মনে হয়।”

মনে হয়!!

বারোটার সময়ে টিভিতেই খবর দিলো, স্টাইভেসান্ট হাই স্কুলের ছাত্রছাত্রীরা সবাই নিরাপদে আছে। কিন্তু, কোথায় আছে তারা? কেউ জানেনা। সেল ফোন কাজ করছেনা। কোনো ইমেলও আসছেনা মেয়ের কাছ থেকে।

ওই দিনটার অনেক গল্প আমি জানি। গল্প নয়। সত্যি কথা। নিজের জীবনের গল্প। ওয়ার্ল্ড ট্রেড সেন্টারের একেবারে ওপরে ১০৮ তলায় ছিল উইন্ডোজ অফ দ্য ওয়ার্ল্ড নামে একটা রেস্টুরেন্ট। সেখানে অনেক বাংলাদেশী মুসলমান কাজ করতো। আমাদের চেনাও দু একজন ছিল সেখানে। তারা আর ফিরে আসেনি।

আমার পরিচিত অনেকেই শেষ হয়ে গেছে সেদিন। বড় বোনের মতো এক মহিলা এ্যাডেল ওয়েলটি। তাঁর ছেলে টিমোথি ফায়ারফাইটার ছিল। সেদিন ভুল তথ্যের ভিত্তিতে ভেঙে পড়া সেকেণ্ড টাওয়ারে ওদের পাঠানো হয়েছিল। পাঠিয়েছিল শাসকশ্রেণী। টিমোথির দেহাবশেষ আর পাওয়া যায়নি।

ইমিগ্রেন্ট অধিকারের তৃণমূল সংগঠক হিসেবে কাজ করার সময়ে পরিচয় হয়েছিল এক কৃষ্ণাঙ্গিনীর সঙ্গে। তিনি থাকতেন গ্রাউন্ড জিরো এলাকার একটা ফ্ল্যাটে। তাঁদের বলা হয়েছিল বাড়ি ছাড়তে হবেনা। সব ঠিক আছে। শাসকশ্রেণী বলেছিলো। লরা এক বছরের মধ্যেই ক্যান্সারে আক্রান্ত হয়েছিলেন। পাঁচ বছর লড়াই করেছিলেন। তারপর আর পারেননি।

রাত এগারোটার সময়ে আমাদের মেয়ে বাড়ি ফিরে এসেছিলো। যেহেতু ওদের সেই বিখ্যাত স্কুলেও কোনো ইভাকুয়েশন প্ল্যান ছিলোনা, এবং স্কুলের মধ্যে ট্রিয়াজ স্টেশন তৈরী করা হয়েছিল — অর্থাৎ মৃত অথবা অর্ধমৃত মানুষদের নিয়ে এসে রাখা হচ্ছিল সেখানে — তাই ছাত্রছাত্রীদের বলা হয়েছিল তোমরা জাস্ট স্কুল থেকে বেরিয়ে গিয়ে উত্তর দিকে হাঁটতে থাকো। প্রায় দেড় হাজার ছাত্রছাত্রী ছোট ছোট দল বেঁধে হাঁটতে শুরু করেছিল। এভাবে তিন চার মাইল হাঁটার পর মেয়ের দল পৌঁছেছিল এক বান্ধবীর মায়ের অফিসে। সেখানে সারাদিন কাটিয়ে তারপর বাড়ি ফেরা। কিন্তু ফেরার উপায় নেই। ম্যানহাটান থেকে ব্রুকলিন আসবার সমস্ত ব্রিজ বন্ধ।

রাত আটটায় ওদিকে গাড়ি রেখে আবার হাঁটা। আবার তিন কি চার মাইল। অনেক রাতে ধুলো ও ছাই সর্বাঙ্গে মাখা কন্যাকে ফিরে পেলাম। এই হলো আমাদের নিজেদের ৯/১১’এর গল্প।

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আর একটু বাকি আছে। সারা পৃথিবীর চোখে “সবকিছু ব্যাক টু নরমাল” বার্তা পৌঁছে দেবার জন্যে শাসকশ্রেণী দু তিন সপ্তাহ পরেই স্টাইভেসান্ট হাই স্কুল আবার খুলে দিয়েছিলো। তখনও গ্রাউন্ড জিরোতে আগুন জ্বলছে। বাতাস বিষাক্ত পদার্থে ও ধোঁয়াতে ভারী। ফ্রি অ্যাসবেসটস আকাশে অসংখ্য। কিন্তু বিখ্যাত দুই প্রতিষ্ঠান — নিউ ইয়র্ক স্টক এক্সচেঞ্জ এবং স্টাইভেসান্ট হাই স্কুল — খুলে দেওয়া হলো। বাকি সমস্ত স্কুল কলেজ দোকান বাজার প্রতিষ্ঠান সেখানে তখন বন্ধ।

শুধু তাই নয়, সস্তায় হবে বলে চূর্ণবিচূর্ণ টুইন টাওয়ার্স থেকে নিয়ে আসা সমস্ত লোহা লক্কড় আরও হাজার গার্বেজ নিউ ইয়র্ক সরকার স্টাইভেসান্ট হাই স্কুলের ঠিক পাশেই বজরার ডকে বোঝাই করতে শুরু করলো — স্কুল চলাকালীনই। সে গার্বেজ বিক্রি করা হয়েছিল ভারত এবং আরো কতগুলো তৃতীয় বিশ্বের দেশে।

আমরা স্টাইভেসান্ট হাই স্কুল পেরেন্ট এসোসিয়েশন রাস্তায় নেমে সপ্তাহের পর সপ্তাহ প্রতিবাদ প্রতিরোধ মিছিল ও সমাবেশ করেছিলাম। মিডিয়াতেও আমাদের কথা বহুবার বলা হয়েছে। কিন্তু শাসকশ্রেণী কর্ণপাতও করেনি। তখন নিউ ইয়র্কে মেয়র ট্রাম্পের এখনকার আইনজীবী রুডি জুলিয়ানি।

আমাদের মেয়ে এখনো ভালো আছে। সুস্থ আছে। কিন্তু অনেকে নেই। তীব্র মানসিক অবসাদের শিকার হয়েছে ওর অনেক বন্ধু ও বান্ধবী। স্কুল ছেড়ে দিয়ে চলে গেছে কেউ কেউ। কয়েকজন নিউ ইয়র্ক ছেড়েই চলে গেছে। এরা সবাই স্কুলের জানলা থেকে দেখেছিলো, টুইন টাওয়ার্স থেকে লোকেরা ঝাঁপিয়ে পড়ছে নিচে।

যারা সিগারেট খেতো, তাদের মধ্যে ক্যান্সারের সম্ভাবনা আছে বলে বিজ্ঞানীরা মন্তব্য করেছেন।

অনেক পরে, অনেক ধর্ণা, মিছিল, কনফারেন্স, কংগ্রেস সদস্যদের সঙ্গে মিটিংয়ের পর নিউ ইয়র্কের ওই এলাকায় যারা বসবাস করতো, কাজ করতো, ব্যবসা করতো, বা স্কুল কলেজ করতো — তাদের জন্যে গ্রাউন্ড জিরো হেলথ ফান্ড তৈরী করেছে মার্কিন সরকার। কারণ, কয়েক শো নিরীহ মানুষ নানারকম মারণরোগের শিকার হয়েছে। অনেকে মারা গেছে। অনেক ফায়ারফাইটার মারা গেছে পরে — ওই টিম ওয়েলটির মতোই। বহু রেসকিউ ডগ মারা গেছে।

তাদের হিসেব আছে তাও। হিসেবের মধ্যে নেই আরো কয়েক হাজার। তারা পরিচয়হীন মেক্সিকান ইমিগ্রেন্ট শ্রমিক। তাদের কাজে লাগানো হয়েছিল গ্রাউন্ড জিরো পরিষ্কারের কাজে। তারপর তারা হারিয়ে গেছে। কেউ তাদের খোঁজ রাখেনা।

আমরাও রাখিনি।

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নিউ ইয়র্ক

১১ই সেপ্টেম্বর, ২০১৯

Photo Courtesy: Creative Commons (for non-profit, educational use only)

NRC, और RSS-BJP का क्रूर खेल। कीमत कौन देगा?

हां, अमित शाह ने बांग्लादेशी अप्रवासियों को कई बार “दीमक” कहा है (याने चीटि जो सबकुछ चाटकर खा जाते हैं)। जिस तरह अमेरिका में ट्रम्प ने मैक्सिकन प्रवासियों को “बलात्कारी और हत्यारे” कहकर संबोधित किया।

भारत के मोदी-शाह-योगी और अमेरिका में ट्रम्प और उनकी रिपब्लिकन पार्टी के साथ बीजेपी पार्टी में क्या समानता है! अभी दोनों पार्टियों का चौंका देने वाला दबदबा है – भाजपा में हिंदू शब्द का जो दबदबा है, रिपब्लिकन पार्टी में वही G.O.P. या ने सफेद क्रिस्टियन लोगों का महत्व है। स्टीव मिलर, ट्रम्प के अप्रवासी-नफरत करने वालों में प्रमुख व्यक्ति हैं। शायद, जैसे भारत में अमित शाह।

अजीबोगरीब ढंग से, कई और समानताएँ हैं। रिपब्लिकन पार्टी के पीछे बड़ी हिंसक ताकतें हैं – नेशनल राइफल एसोसिएशन (एनआरए) और कु क्लक्स क्लान (केकेके) जैसे चरमपंथी संगठन। ऐसे ही रास्ट्रीय स्वयंसेवक संघ(आर.एस.एस)भाजपा के पीछे।

नफरत के ताकत पर हिंसा इन दोनों पार्टियों का अंदरूनी जोश या ताकत है | मैं पूरा यकीन से ये इसलिए कह सकता हूँ, क्योंकि मे १९६२ से १९७९ तक आर.एस.एस का सदस्य रह चुका हूँ |

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गोएबल्स कहा करता था, अगर एक झूठ का हजार बार लोगों को बताया जाता है, तो लोग धीरे-धीरे उसी रिपोर्ट को सच मान लेते हैं। भारत में या यहाँ अमेरिका में, मीडिया ने वही गोएबल्सियन मॉडल का पालन करना शुरू कर दिया है।और आबाम को पूरी तरह से वही झुट घेर लिया है। समझना तो दूर, किसी को इस बात का भनक भी नही लग सकता कि देशभक्ति ही वास्तव में लोकतंत्र का विरोध है जो कि पुरी तरह से जल्द है। और जो ही इसका खिलाफ आवाज करे, उनको लगा दो देशद्रोही तकमा, और मौका मिलने पर इसे खत्म करने के लिए शारीरिक या मानसिक रूप से गन्धी खेल खेला जा रहा है। गौरी लंकेश, कलबुर्गी, पनेसर हो या, अमर्त्य सेन, अरुंधति रॉय, मेधा पाटेकर, नसीरुद्दीन शाह।

NRC इसी खेल का एक अध्याय है। कश्मीर, पुलवामा के बाद अब NRC का यह घिनोना खेल। बिश लाख निर्दोष लोगों का जीवन बर्बाद हो रहा है। अवसाद से लेकर मानसिक बीमारी और यहां तक ​​कि आत्महत्या पर मजबूर हो रहा हैं लोग। जिन्दगी भर भारत में रहने के बाद – बंगाली हिंदू या मुस्लिम परिवार – अब बिना किसी स्थिति के है। यानी वे भारत के नागरिक नहीं हैं। किसी देश से नहीं। इसलिए, वे निराशा, गरीबी, बीमारी, शोक, भुखमरी, चिड़चिड़ापन की से उथलपुतल हो रहे हैं।

यह उन्नीस-बीस लाख मुसलमान और बंगाली आर्थिक रूप से हो या शारीरिक रूप से कहाँ जाएंगे? या तो वे मजबुरन छुप जायेंगे, या फिर वो जेल मे जबरदस्ती कयेद किये जायेंगे नही तो मजबुरन मर जायेंगे मिट जायेंगे । जैसे ट्रम्पयुग का अमेरिकी मॉडल, वैसा ही भारत में शाह-योगी युग का माँडल ~ जहां निजी जेलों का भी निर्माण किया जायेगा । और कयेद किये गये लोग ही इन पूँजीवादी लोगोंका व्यवसायों की भरपाई करेगा (जेसा ऊन जमाने मे बन्धुया मजदुर किया करते थे) | जितने ज्यादा कैदी, उतना ज्यादा मुनाफा। संयुक्त राज्य अमेरिका में जियो और सीसीसी – ये दो निजी जेल निगम खुले बाजार मे अपने शेयर का ट्रानजाकशन करते हैं। सुनकर चौंक गए ना? फिर खुद ही गूगल के जरिये इस बात कि पुष्टि कर लीजिए ।

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फिर….. फिर क्या…..

बही रोहिंग्या लोगो की ढंग से, सभी शरणार्थियों के रूप में होगा | उनमें से अनगिनत लाखों बांग्लादेश में दिखाई देंगे, या पश्चिम बंगाल मे ….

लोगो को शरणार्थी बनाने का ये साजिश ~ बन्धुआ मजदूर बनाने का ही एकाएक हिस्सा हैं, कंहा हो, इससे कोई फर्क नही पड़ता !! वह भी साजिश का हिस्सा है।

अभी, बांग्लादेश और भारत ~ इन दोनो देखो का मुद्रा का मान अब एक ही बन चुका हैं | भारत का ईकनमि (अर्थव्यवस्था) डूब चुका हैं, अब बांग्लादेश और पाकिस्तान का ईकनमि (अर्थव्यवस्था) भी अगर साथ साथ ही डूबे तो भारत का वर्तमान शासकों का राजनीतिक फायदा होगा |

खेल बहुत बड़ा है सभी खिलाड़ियों और उनकी रणनीतियों को अच्छी तरह से समझने की जरूरत है। बल्लेबाज, गेंदबाज, क्षेत्ररक्षक, विकेटकीपर, कोच।

इसके के बाद, यही खेल का उपोत्पाद होगा ~ खौफ और हिंसा का शर्मनाक आतंक ।
जितना दर्दनाक ढंग से लोगों को दबाव और कुचला जायेगी , उसकी प्रतिक्रिया मे तब उतनी ही अधिक नफरत और अधिक उत्पीड़न होगी।

अधिक गरीबी, अधिक भूख, अधिक निराशा, अंध कट्टरता। रुड़ीबादी के अंन्ध नजरों मे होगा ~ हिंदू और मुसलमान।

लेख के शीर्षक में मैंने पूछा, “कीमत का भुगतान कौन करेगा?”

अब आप उस प्रश्न का उत्तर दें।

मैं नहीं दूंगा।

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Translation from English by Gautam Basu.

Photo courtesy: For non-profit, educational use: The Hindu.


National Register of Citizens, India’s “Pogrom” Begins.

Indian government’s new National Register of Citizens (NRC) drove nearly two million innocent people off their citizenship status, causing havoc. The Hindu supremacist government’s actions and rhetoric are similar to Trump’s, and eerily remind us of Hitler’s pogrom in Germany.

“Who’s going to pay the price?”

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Yes, India’s police minister Amit Shah often called Bangladeshi immigrants “termites.” Just the same way, here in America, Trump called Mexican immigrants “rapists and murderers.”

How strikingly similar are India’s BJP of Modi and Shah, and America’s Republican Party (or GOP) of Trump! Both parties are supremacist: BJP is Hindu supremacist, and GOP is white Christian supremacist. The mastermind of Trump’s anti-immigrant hate is Steve Miller. And in India, it’s perhaps Amit Shah.

There are other similarities. Behind the Republicans are huge and violent forces, such as National Rifle Association (NRA) and KKK. Behind BJP is extremely militant RSS, an organization I was deeply involved with from 1962 through 1979.

Both KKK and RSS have been ardent supporters or followers of Hitler, Mussolini or such fascist or Nazi forces. Both organizations are anti-immigrant, anti-black, and anti-Muslim. Both are fiercely anti-socialist. In India, RSS is also fiercely anti-Christian, but they have downplayed it now, because they don’t want to irk Trump and lose his support.

Both BJP and GOP are for total privatization of the economy. In fact, they want to do away with the government; to them, as Ronald Reagan said, “Government is the problem.” They want to keep a skeletal government, mainly for military, police, and mass-spying agencies such as FBI and CIA in America, and RAW in India.

Most importantly, both forces want to use a democratic electioneering system to actually destroy and replace the traditional system with an authoritarian “One religion, one country, one language, one leadership” structure.

In fact, that is a stark reminder of how Hitler came to power in Germany.

In 1930’s Germany, Hitler called the Jews something similar to what Trump calls the Mexican immigrants and Amit Shah calls the Bangladeshis. He called the Jews “dangerous bacillus,” which means germs, bacteria. But because nobody reads history anymore, or analyzes it, reality like it is now forgotten or ignored.

Especially today, in case of India, the people in power want to divert people’s attention off the gravely ill economy, catastrophic climate crisis, unemployment, income inequality, or the countrywide violence on women and other weaker sections of the society. The manipulated, artificial crisis in Kashmir or the new NRC crisis in Assam is highly expedient.

On one hand, we have massively rich communities like Ambani and Adani (or in case of America, the Walton family or Koch Brothers), and with them we have their Goebbels-style media corporations, working closely with Trump, Modi, Shah, and RSS’ supremo Bhagwat.

Goebbels said, “If you tell a lie big enough and keep repeating it, people will eventually come to believe it.” In today’s India and USA, corporate media have been following that model for a long time. And they have successfully brainwashed the ordinary people. Nobody realizes that in a true democracy, dissent is essential; in fact, dissent is patriotic. Now, with mafia on the ground, Indian voices of dissent are branded as traitors. They are heckled and harassed. In cases like Gauri Lankesh, Kalburgi or Panesor, they have killed those voices. For others like Amartya Sen, Arundhati Roy, Medha Patekar or Nasiruddhin Shah, they have undermined their credibility.

The new NRC chapter is an integral part of this game. We’ve had Pulwama, and we’ve have Kashmir. Now the new episode is Assam and NRC. The so-called National Registration of Citizens pushed off two million (twenty lakhs) ordinary, innocent people of Indian citizenship, and put them in serious jeopardy. These people are mostly Bengali Muslims or Hindus, many are lifelong Indian residents. Now they are without status. They are neither Indian, nor Bangladeshi, nor of any other country. Major despair, poverty, disease, starvation, joblessness face them. Some have already killed themselves after the government published the first list of “non-citizens.”

This is a historic chapter of barbarism. An international crime – crime that global media such as the New York Times, BBC, the Guardian and Al Jazeerah have all strongly criticized.

Where are these two million people going to go, from an economic and social point of view? They will escape and hide for some time, and they will then die, or go to prison camps Indian government is building following U.S.-style private prison. America’s private prison is all about making profit out of putting people in jail. They even trade their shares on the stock market. Don’t believe me? Look up Geo and CCC – two big private prison corporations on Google.

Then, out of these hapless people, many would end up in Bangladesh (or West Bengal) to save lives – the way Rohingya refugees did. That is going to put major financial and space burden on Bangladesh, which is perhaps a part of the game too. Squeeze Bangladesh’s economy to death, because right now, India’s economy is sinking and Indian rupee has hit an all-time low. Make Bangladesh and Pakistan equally miserable, and save face. We need to understand all these various pieces of the puzzle – the various elements of the big game.

Then, end result of all this misery would be more violence, and more terrorism. And reaction to that violence and terror would be more violence, war, hate, bigotry, and repression. More hunger, despair, and more religious fanaticism and social divisiveness. Both on the Hindu and Muslim sides.

So, let us try to answer the question I asked above, “Who’s going to pay the price?”

I wait for your answer.

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Photo courtesy: CNN (not-for-profit, educational use)

RIP, David Koch of Koch Brothers. (Sorry to hear you died, but you have done massive harm to us.)

[I am sad to know David Koch of Koch Brothers died. But I can’t help but mention the massive harm they have done to us the 99%, and to mankind in general.]

How many people understand the importance of international news, or of certain extremely important people who are not daily features on mainstream media?

People know about the craziness of Donald Trump. People laugh about his desire to buy Greenland. People here in America — those who keep in touch with global news — about what’s happening in Kashmir, and what happened in Gujarat when Modi was chief minister. Right now, people are shocked to see what’s happening in the Amazon rain forest. Bolsenaro’s eerie similarity with Trump.

Meanwhile, few understand the importance of the death news of David Koch, one of the two infamous “Koch Brothers” here in the U.S. Even most Americans do not know, because they have kept a low profile, even when they have destroyed democracy in America, with their money and political power. Wall Street Journal, predictably, published an obituary on David Koch with a glossing over brush: they showed how much of a philanthropist he was.

Yet, Koch Brothers have been incredibly monstrous in their actions on a number of critical fronts: (1) They created Prosperity for America, a think tank that pumped money and political influence across the country to completely destroy FDR’s New Deal, deregulating from education to health care to social security to businesses; (2) They have been the ultimate influences to deny climate change, and bring back the fossil fuel industry (they themselves are big oil barons, with [corrected] Charles Koch spending [corrected: a part of] his entire oil fortune to establish John Birch Society, a far right anti-socialist organization); and (3) Koch Brothers were primarily responsible for enacting Citizens United, a U.S. law that legitimized big corporations to buy elections with their money, where corporations would be treated as individuals, and they didn’t have to disclose their names or amounts of contribution.

Why is a discussion on Koch Brothers important in the context of India also? Because, what Ambanis and Adanis are doing in India today is taken straight from Koch Brothers’ book. Today, around the world — from U.K. to Brazil to Sweden to India to Turkey to France — far right, violent, fascistic forces are trying to grab all the economic and political power, with financial backing of such extremely rich, conservative people and their business houses.

That discussion is critical, if we want to stop their onslaught on democracy, humanity, and the existence of earth, as we know it.

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For more on Koch Brothers:

Robert Greenwald’s documentary Koch Brothers Exposed

http://www.unkochmycampus.org/los-ch3-part-2-kochs-roots-the-john-birch-society

The John Birch Society

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১৫ই আগস্ট। ভারতের স্বাধীনতা, গান্ধীহত্যা, এবং বাংলাদেশে মুজিব হত্যা।

To show my patriotism, I share some precious history about India’s Independence, and about Gandhi and Mujib assassinations by Hindu and Muslim fanatic groups.

পনেরোই আগস্ট।

১৯৪৭ সালে এই দিন ভারত স্বাধীন হয়েছিল, এবং আমাদের দেশকে ব্রিটিশরা তিন টুকরো করে দিয়ে, সব সম্পদ লুটে নিয়ে অবশেষে ফিরে গিয়েছিলো। অর্থনৈতিকভাবে এবং সামাজিকভাবে একটা অতি ধনী ভূখণ্ড ও তার মানুষকে দুশো বছরের মধ্যে সর্বস্বান্ত করে দিয়ে, হিংসা ও ঘৃণার বীজ বুনে দিয়ে, এবং ফিউডাল ও রক্ষণশীল জাতের একটা শ্রেণীর হাতে ক্ষমতা তুলে দিয়ে চলে গিয়েছিলো তারা। রক্তাক্ত হয়েছিল বিশেষ করে বাঙালি ও পাঞ্জাবি এই দুই জাতি।

এসব কথা কিছু কিছু অনেকে জানে। কিন্তু নতুন প্রজন্ম বিশেষ করে যেটা জানেনা, বা তাদের জানানো হয়নি, তা হলো মহাত্মা গান্ধী দক্ষিণ আফ্রিকা থেকে ভারতে আসার প্রায় একশো বছর আগে থেকেই ভারতীয় হিন্দু ও মুসলমানরা একসাথে ব্রিটিশবিরোধী স্বাধীনতা আন্দোলনে সক্রিয় ছিল। হাজার হাজার মানুষ প্রাণ দিয়েছে, সর্বত্যাগ করেছে। জেলে অত্যাচারিত হয়েছে। ফাঁসি গেছে। শহীদ ভগৎ সিং, শুকদেব, রাজগুরু, ক্ষুদিরাম, চন্দ্রশেখর আজাদ, প্রফুল্ল চাকী, সূর্য সেন, প্রীতিলতা, বাঘা যতীন, বারীণ ঘোষ, বিনয়-বাদল-দীনেশ, কানাই-সত্যেন, উল্লাসকর, কল্পনা দত্ত। অসংখ্য নাম। বিবেকানন্দের ভাই বিপ্লবী ভূপেন্দ্রনাথ দত্তের বই “ভারতের দ্বিতীয় স্বাধীনতা সংগ্রাম” পড়ুন। কলকাতা ও ঢাকায় পাওয়া যায়। স্বাধীনতা সংগ্রামে ভগিনী নিবেদিতার সক্রিয় ভূমিকা। আবার পূর্ববঙ্গে বহু মুসলমান যুবক স্বাধীনতা সংগ্রামে শহীদ হয়েছেন। আমরা তাঁদের মনে রাখিনি।

তারপর কংগ্রেস, নেতাজি সুভাষ বসু, মহাত্মা গান্ধী, দেশবন্ধু চিত্তরঞ্জন, নেহেরু, প্যাটেল, তিলক, সুরেন ব্যানার্জি, লাজপত রায়, বিপিন পাল, ইত্যাদি ইত্যাদি ইত্যাদি। অসংখ্য নাম, বিশাল ইতিহাস।

রক্ত যারা দেয়নি, একফোঁটা রক্ত যারা দেয়নি ,স্বাধীনতা সংগ্রামে প্রত্যক্ষ অথবা পরোক্ষভাবে অংশগ্রহণ করেনি, লুকিয়ে ছিল, তারা আজ ভারতের শাসনক্ষমতায়। ও হ্যাঁ, ১৯৪৭’এর ১৫ই আগস্ট আর ১৯৪৮’এর ৩০শে জানুয়ারি — এই সামান্য সময়ের মধ্যেই তাদের কাজ ছিল গান্ধীকে হত্যার ষড়যন্ত্র করা। নাথুরাম গডসে, সাভারকার, গোপাল গডসে, আপ্টে, কারকার, পারচুরে, আরো কয়েকজন হিন্দুত্ববাদী হিংস্র লোক। প্রত্যেকেই আর এস এস, হিন্দু মহাসভা — এই সব চরমপন্থী, সন্ত্রাসী দলের সঙ্গে যুক্ত সক্রিয় কর্মী।

আর এস এস কখনো গান্ধীহত্যার জন্যে ক্ষমা প্রার্থনা করেনি। নাথুরাম গডসে ফাঁসির দড়িতে ঝোলবার আগে আর এস এসের প্রার্থনা “নমস্তে সদা বৎসলে মাতৃভূমে” আবৃত্তি করেছিল — এরকমই ইতিহাস পড়েছি আমি। আর এস এস নয়? (আমি আর এস এসে থাকার সময়ে এসব কথা কখনো শুনিনি। কেউ বলেনি।)
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ফাস্ট ফরওয়ার্ড। আমরা তখন কলেজে পড়ি। ১৯৭৫ — জরুরি অবস্থা ভারতে সবে জারি হয়েছে। এই সময়ে এক সন্ধ্যেবেলা পানের দোকানের ট্রানজিস্টর রেডিওতে খবর শুনলাম। ঢাকায় একদল হিংস্র আততায়ী শেখ মুজিবের বাড়িতে ঢুকে বাড়ির সবাইকে গুলি করে শেষ করে দিয়ে গেছে। শিশুরা পর্যন্ত রেহাই পায়নি। অনেক পরে ধানমণ্ডির সেই বাড়িতে গিয়ে দেখে এসেছিলাম। দেওয়ালে এখনো বুলেটের আর রক্তের দাগ।

কারা মেরেছিলো মুজিবকে? এখন আমরা সবাই জানি। ইসলামী চরমপন্থী, সন্ত্রাসী দলগুলোর লোকজন, আর তাদের সঙ্গী মিলিটারির কিছু সৈন্য ও জেনারেল। শেখ হাসিনা এবং বোন রেহানা সেই ভয়াবহ গণহত্যা থেকে রেহাই পেয়েছিলেন ভাগ্যক্রমে। তাঁরা তখন ব্রিটেনে ছিলেন। আজ শেখ হাসিনা বাংলাদেশের প্রধানমন্ত্রী। শহীদের মেয়ে শহীদের রক্তের দাম বোঝেন।

হ্যাঁ, কংগ্রেস প্রচন্ড দুর্নীতি করেছে ভারতে। হ্যাঁ, মুজিবুর রহমান অনেক জনবিরোধী কাজ করেছেন ১৯৭১’এর ডিসেম্বর থেকে ১৯৭৫’এর আগস্ট পর্যন্ত। সমাজবাদী দলগুলোকে, শ্রমিক দলগুলোকে শেষ করে দিয়েছেন। ব্যক্তিকেন্দ্রিক, পরিবারতান্ত্রিক শাসনব্যবস্থা কায়েম করেছেন। ঠিক ইন্দিরা গান্ধীর মতোই।

ঠিক যেমন মহাত্মা গান্ধী জমিদার, জোতদার, সামন্ততান্ত্রিক, রক্ষণশীল, এবং পুঁজিপতি শিল্পপতিদের স্বার্থরক্ষা করেছেন। বিপ্লবী ও বামপন্থীদের পাৰ্জ (purge) করেছেন কংগ্রেস থেকে। সমাজবাদী মনোভাবের, সৎ ও অসাম্প্রদায়িক শক্তিগুলোকে ক্ষমতাহীন করেছেন। 
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কিন্তু তাও মহাত্মা গান্ধী শহীদ। শেখ মুজিবুর রহমান শহীদ। ইন্দিরা গান্ধী শহীদ। রাজীব গান্ধীও শহীদ। ক্ষুদিরামের ফাঁসি হয়েছিল। ভগৎ সিং, শুকদেব, রাজগুরুর। দীনেশ গুপ্তর। প্রফুল্ল চাকীর মাথা কেটে ট্রেনে কলকাতায় পাঠিয়েছিল ব্রিটিশ পুলিশ সনাক্ত করার জন্যে। সূর্য সেনকে জেলে অত্যাচার করে মেরে ফেলেছিলো ওরা। সন্ধ্যা, কল্পনাকে যৌন অত্যাচার করেছিল।

আর এস এস তখন নাগপুরে, বেনারসে রাস্তায় রুট মার্চ করছে।

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শেখ মুজিবকে মেরেছিলো কিসিঞ্জার ও সি আই এ (অর্থাৎ মার্কিন শাসকশ্রেণী)’র মদতপুষ্ট জঙ্গী ইসলামী শক্তি ও তাদের সমর্থক মিলিটারি। পাকিস্তানে জুলফিকার আলী ভুট্টোকে ফাঁসি দিয়েছিলো মিলিটারি শাসকরা। তাদেরও পিছনে ছিল সিআই এ (অর্থাৎ মার্কিন শাসকশ্রেণী)।

আজ ভারতের স্বাধীনতা দিবস। একটু ইতিহাস পড়া, ইতিহাসের গল্প জানা — বোধহয় ভালো।

দেশপ্রেম হলো শিক্ষার, চেতনার আলোতে, ইতিহাসের আলোতে জীবন কাটানো।

অন্য সব দেশভক্তি — ওই নাথুরাম গডসে, সাভারকারের দেশপ্রেমের মতো। 
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কাল রেকর্ড করা আমার ভিডিও আলোচনা এখানে দেখুন প্রশ্ন করুন। চ্যালেঞ্জ করুন। শেয়ার করুন। Link at https://www.youtube.com/watch?v=uS8x2Il-o2U

Let’s Talk India’s Independence Day!

August 15, 2019 is India’s 72nd Independence Day. This is also the day when the British forces partitioned the country in three pieces, causing massive trauma and bloodshed. Now, fascist and fanatics forces have won elections and taken the country over. They are destroying democracy and diversity of a once-peaceful land.

Today, with the backdrop of India’s 72nd Independence Day, Humanity College arranged for a half-hour video talk — 30 minutes in English, followed by 6 minutes in Bengali — to visit the critical situation in the subcontinent. Democracy is on its way out, and the ugly head of fascism is rising in the horizon. The Kashmir crisis is the latest example.

Here’s the ultimate irony.

People who did not shed even a drop of blood for India’s glorious 100+ years of freedom struggle, and killed Mahatma Gandhi are now in the seat of power in India. Not the same people, but their followers anyways. RSS and its many offshoot organizations including the ruling BJP have never believed in a diversity-based secular India. They have been ardent followers of Hitler and Nazi Germany.

Religious fanaticism on one hand with hate and division as its political tool, and extreme corporate power on the other hand with the richest of the rich taking control of the country’s economy (exactly following the current U.S. system) are destroying beyond recognition the land — my motherland — that was until recently a symbol of religious tolerance and renunciation of greed, self-centric lifestyle, and violence.

With the followers of Hitler and his hate in power, India is unraveling. In my video talk, I spoke about the grave situation, and also pointed out about some major movements of resistance.

I hope you take the time to watch the video, and if you like it, share. Comments and feedback welcome.

Sincerely,

Partha Banerjee

Brooklyn, New York

कश्मीर संकट, Article 370, नई युद्ध की स्थिति, भाजपा और आरएसएस

Translated by  Gautam Basu

आरएसएस बीजेपी पार्टी को चलाता है (RSS यानी हिन्दू अलगाववादी BJP पार्टी को चलाता है)।  मोदी, अमित शाह, अरुण जेटली सभी आरएसएस के कट्टर सदस्य हैं।  (वाजपेयी, आडवाणी या मेरे पिता जितेंद्रनाथ की तरह) ।

दूसरी ओर, यानी स्मृति ईरानी हैं।  प्रकाश ठाकुर। 

शुभ मौसम  राज्य सेवा संघ।

वे कहते हैं कि वे स्वयंसेवक हैं।  (हम बंगाल में स्वेच्छासेबक कहते हैं, लेकिन वे कहते हैं कि वे स्वयंसेवक हैं)।

जब मैं लंबे समय तक उनके साथ था, तो हम इस बारे में हंसते थे – “स्वयंसेवकवाद”, यानी खुद की सेवा खुद ही करना।

जो भी हो। भाजपा की सबसे महत्वपूर्ण नीति और कानून आरएसएस का समर्थन से ही बनते है। नीतियो का और पॉलिसी सभी का ब्लूप्रिंट आरएसएस मुख्यालय से पुरा बनने के बाद ही, दिल्ली में सिर्फ ठप्पा लगाने के लिए जाते हैं।

संबिधान का धारा ३७० जो कश्मीर के उस विशेष खंड के लिये विशेष रुप से बना था – उसे रद्द करने का निर्णय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का एक लंबा सपना है।
परिणामस्वरूप, पाकिस्तान के विरुद्ध उग्रवादी विरोध को देखा जा सकता है, लेकिन इसके परिणाम घातक होंगे। मैं यकीन से कह रहा हूँ, प्रारंभिक रुप से कितना भला ही दिखता हो, इसका अंन्त बहुत ही खतरनाक और ध्बंसात्मक होगा ।

अंतरराष्ट्रीय कानून हो या संयुक्त राष्ट्र की नजरो में ~ सभी कानून को पूरी तरह से अनदेखा कर दिया गया है। ट्रम्प का अमेरिका और इज़राइल लंबे समय से ऐसा ही, अन्तरास्ट्रीय कानूनों को अनदेखी करते चले आ रहे रहे हैं।

कोई भी फासीवादी ताकत अंतरराष्ट्रीय कानून की अवज्ञा करती है। हिटलर ने भी ऐसा ही किया और आज अमेरिका पूरी दुनिया में ऐसा कर रहा है। अब संयुक्त राज्य अमेरिका पाकिस्तान को अपने हाथों में रखने के दो नियम कहेगा।

विशेष रूप से, एक बड़े युद्ध की स्थिति में बहुराष्ट्रीय निगमों के व्यापार को बाधित करना।

जो केवल, युद्ध का सामान बेचते हैं, या हजारों अन्य युद्ध सामग्री – कंप्यूटर से माइक्रोचिप तक विमान से चिपके हुए प्लास्टर, और खुफिया एजेंसी के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस – एसे लाभ के लिए याने युद्धों को बनाये रखने के लिये ऐसा कदम भला ही बहुत महत्वपूर्ण हो, इससे आम आदमी कि भलाई कभी नही होगा ।

बाकी सभी का, याने शान्ति और नुकसान।

लेकिन चूंकि अमेरिका व्यापार की वास्तविकता में ही युद्ध चाहते हैं। क्यों के युद्ध का हथियार बेचना ही अमेरिकी अर्थनीति का मुल्क मकसद हैं । आरएसएस को भलीभाँति ये जानकारी है कि अगर अमेरिका को युद्ध में रखना है, तो युद्ध जारी रहना चाहिए, हमें हथियार खरीदना है।

अमेरिका आलू के चिप्स या फोर्ड कारों की तरह युद्ध को बेचता है। युद्ध अमेरिका की अर्थव्यवस्था और महाशक्तियों की वास्तविक शक्ति है। हर साल द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से, हर जगह युद्ध हुए हैं – कोरिया, वियतनाम, अंगोला, चिली, इराक अफगानिस्तान, भारत, पाकिस्तान बांग्लादेश – अमेरिकी युद्ध कारोबारियों ने, हर जगह युद्ध का वास्तविक व्यापार करते चले आ रहे हैं।

जिन दोनों देशों के बीच युद्ध होता है, और दोनों देश अमेरिकी बम-बंदूक या ड्रोन का उपयोग करते हैं। कितना सुंदर कारोबार है!

आरएसएस हिटलर का समर्थक था, और दूसरी ओर, गुपछुप से अंग्रेज भी उनके खास पसन्दो मे से था।

कितना अजीब इतिहास है!

आरएसएस ने स्वतंत्रता के लिए एक बूंद खुन का बलिदान कभी भी नहीं किया। चूंकि अब कोई भी इतिहास नहीं पढ़ता है, इसलिए अब कि युवाओं के दिमाग में “देशप्रेम या ने जय श्रीराम” को घूसाना आसान हो गया है।

India’s Defeat in World Cup Cricket

India exits from World Cup cricket today. But media, politicians and celebrities never criticize the sports, the players, and the deep politics and corruption. The game and its hype distracts people from real-life problems.

India lost today to New Zealand in World Cup Cricket, and ended its 2019 tournament. New Zealand, once a minnow in cricket, will now play the championship match either with England or Australia. The tournament is being played in England.

India spends billions of dollars in cricket. It does not have money for any other sports, and India has a miserable show on global sports arena. There is no lack of men and women talents in the enormous country, but the ruling powers and their billionaire corporations never cared for sports and games and athleticism.

India’s show in other international sports events such as the Olympics has been pathetic. Why? Because cricket has all the money, cricket has all the media attention, and cricket has all the corporate sponsorship. Yet, only ten countries participate in World Cup, out of which England, Australia, New Zealand, South Africa and West Indies do well in many other games. India does not.

USA, Russia, China, France, Germany, Brazil, Cuba, Belgium, Holland and other such giant sports countries never play cricket: the entire cricket culture is confined to English colonial nations we loosely call the Commonwealth. But courtesy media hype, even the local paan shop vendor and rickshaw puller take interest in cricket, believing India is truly number one in the world. It gives them pride.

A massive ultra-patriotism springs up. Work at offices practically comes to a halt when India plays cricket. Players on the Indian team are worshiped like gods. And some of them are extremely arrogant: police cases have been filed against some of them for their bar brawls, etc. Some of them have been given a slap on the wrist for their alleged involvement in multi-billion-dollar mafia betting and underground gambling and match fixing. All star players are multi-millionaires in a very poor country, where the poor do not have enough to eat, can’t send their children to school, and end up living on the streets — even in harsh cold or hot weather.

Even after this embarrassing defeat today, there is hardly any criticism of either the players or the way they failed. Indian ruling class has found a great way to distract people from their miserable money, health, education, environment, racism and sexism problems with this magnificent toy. Most Indian know the names of their celebrity cricket players, but cannot tell the names of their prime minister, finance minister, or health or education minister.

Indian society never criticizes their gods and goddesses who are rich and famous and flamboyant and flim flam. Media and big-name politicians and celebrities ask them not to do it. Life goes on without a hitch (for the one percent) that way.

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Meet Amit Shah, India’s New Home Minister.

Home Minister in India is the man who is in charge of the country’s national security and immigration. And people have many reasons to be afraid.

It is a massively important position, and can be argued that it’s even more powerful than the position of the prime minister, when it comes to life, livelihood, dignity and safety of the 1.2 billion men, women and children living in India. 

Prime Minister Narendra Modi, after getting elected for the second five-year term with a landslide victory, gave Amit Shah the Ministry of Home. In USA, the position perhaps would be a combination of the Secretary of Homeland Security and Attorney General, even though India has a lesser important cabinet called Ministry of Law and Justice. In India, the Home Minister has traditionally been the Number Two position. Very powerful home ministers have included L. K. Advani under then prime minister A. B. Vajpayee, and long ago, the famous Vallabh Bhai Patel under Jawahar Lal Nehru, the first prime minister of independent India.
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However, contrary to Patel or Advani, most people today in India don’t even know who Amit Shah is. They don’t know what type of a man he is, what philosophy of life and politics he believes in, from which political circles he rose from, what kind of acts he committed before, and what kind of quotes he made publicly many times over. You can click on the above links, and find out.

I am going to include only one of Amit Shah quotes, to make you oriented with the beliefs and visions of India’s new home minister Amit Shah. On Bangladeshi Muslim immigrants, he said, “The illegal immigrants are like termites who need to be thrown in the Bay of Bengal.” It was his idea to introduce a bill in parliament to grant citizenship to minorities from neighboring countries, except Muslims.

What is Amit Shah now responsible for? Among other things, he will deal with India’s civilian and military police, general law and order, internal security, the sensitive subject of Jammu and Kashmir, terrorism (fake or real), border security and immigration, the citizenship issue like the one we mentioned above, espionage and surveillance (traditional and online), civil rights and liberties, atrocities on women, “low-castes and untouchables,” communal violence and riots, problems with refugees and “invading outsiders,” political and social protests and rallies, and much more.

India is now ranked one of the lowest on the issues of violence on women, Muslims, and other minorities. Major international organizations have placed India at the bottom on global human rights violation issues.

Amit Shah has a dark, checkered past on human rights: he has been accused of extrajudicial killings of Muslims being labeled as terrorists. You can read the reference here (Washington Post article, May 31, 2019).

Never in modern Indian history somebody like Amit Shah has assumed political and administrative powers of this magnitude. Shah comes from the Hindu supremacist organization RSS (National Volunteer Corps), and I have written about RSS many times before on this blog. You can read about the theories and practice of the organization. RSS dictates BJP’s politics, and the most important people on Modi’s cabinet including Modi himself are all RSS members.

Like many international media reported, selection of Amit Shah as the home minister signals a new, ominous chapter in India’s politics. We have enough reasons to believe it’s going to be a chapter rife with heavy-handedness, repression, fear, intimidation, and gross violation of democracy and justice.

I do hope I am proven wrong.

Sincerely Yours,

Partha Banerjee
Long Island, New York

ভারতের নির্বাচনের ফলাফল — মগজধোলাই আর ধর্মান্ধতার জয়।

কী কারণে এমন হলো, একটু দেখে নেওয়া যাক। ভুলে যাবার আগে।

অবশেষে দেখা গেল, শাসক শ্রেণী ও তাদের মিডিয়ার অষ্টপ্রহর গোয়েবলস অপপ্রচার আর মিথ্যাচার সাধারণ মানুষের মগজধোলাইয়ে পুরোপুরি ভাবে সফল। দেশ এখন আবার সরকারি ভাবে ধর্মান্ধদের দখলে। সাধারণ মানুষ অর্থাৎ 99% আজ হিন্দু ধর্মান্ধতা, লাগামছাড়া কর্পোরেট পুঁজিবাদ, হিংসা ও ঘৃণার রাজনীতি, ফ্যাসিজমের পক্ষে রায় দিয়েছে।

পুলওয়ামা সন্ত্রাসে ভারতীয় সেনাদের মৃত্যু, যুদ্ধজিগির, উগ্র দেশপ্রেমের টনিকে খাদ্য, শিক্ষা, অর্থনীতি, দারিদ্র্য, রাস্তাঘাটে বাচ্চাদের পড়ে থাকা — এসব real life issue থেকে মানুষের মনকে ঘুরিয়ে দেওয়া হল।

বেকারিত্ব, চাষিদের আত্মহত্যা, রাস্তাঘাটে, গ্রামেগঞ্জে মেয়েদের ধর্ষণ, মুসলমানদের ওপর, দলিতদের ওপর বর্বর অত্যাচার, ভয়ঙ্কর পরিবেশ দূষণ ও স্বাস্থ্যসঙ্কট, জিনিষপত্র ও পরিবহণের আকাশচুম্বী খরচ, ব্যাংকের সুদ দ্রুত কমিয়ে দেওয়া, দেশজ শিল্প ও কৃষির বিপর্যয়, অর্থনীতির সম্পূর্ণ বেদখল হওয়া, ইত্যাদি অতি জরুরী বিষয় নিয়ে নির্বাচন নামক এই প্রহসনে কোনো আলোচনাই হলোনা।

মানুষের দৃষ্টি নোটবন্দী, জিএসটি, আধার কার্ড এসব থেকে সম্পূর্ণ ঘুরিয়ে দেওয়া হলো। তথ্য, যুক্তি, বিশ্লেষণ এসব অপপ্রচার আর মিথ্যাচারের তোড়ে ভেসে গেল খড়কুটোর মত। এর বিরুদ্ধে প্রতিরোধ গড়ে তোলার মত সেরকম কোন বিপক্ষ শক্তিও আর থাকল না।

কর্পোরেট মিডিয়া ও সোশ্যাল মিডিয়া অতি সফলভাবে নরেন্দ্র মোদীকে একমাত্র নেতা এবং বিজেপিকে একমাত্র দল হিসেবে প্রজেক্ট করতে সক্ষম হলো। ঠিক এই আমেরিকার মতই একপেশে প্রচার হলো। বিরোধী দলগুলোর সেরকম কোনো সর্বজনগ্রাহ্য নেতা বা নেত্রীও দেখা গেলোনা, বা প্রকৃতভাবে একজোট হয়ে লড়াই করার কোনো আকাঙ্ক্ষাও দেখা গেলোনা। রাহুল গান্ধী ও তার পরিবারকে মানুষ অল্টারনেটিভ নেতৃত্ব বলে স্বীকার করতে, মেনে নিতে পারলোনা। রাহুল গান্ধী নিজে নির্বাচনে পরাজিত হলেন। শিক্ষাগত যোগ্যতা ভাঁড়িয়ে, ক্রিমিনাল রেকর্ড চাপা দিয়ে, এবং প্রকাশ্যে ভয়ঙ্কর সন্ত্রাসী উক্তি করেও বিজেপি নেতা ও নেত্রীরা রমরম করে নির্বাচনে জয়লাভ করলেন।

হিন্দি প্রচার, হিন্দু সংখ্যাগুরুত্বের, এবং পুরুষতান্ত্রিকতার জয় হলো। এই জয় আরো বেশি প্রকট হয়েছে অহিন্দিভাষী দক্ষিণী রাজ্যগুলোতে বিজেপির এই ঝড় সম্পূর্ণ রোধের মধ্যে দিয়ে। কেরালা, তামিলনাডু এবং অন্ধ্রতে এই তুমুল বিজেপি ঝড়েও কোনো দাগ কাটেনি। কেরালায় বিজেপি একটাও কেন্দ্রে জেতেনি। ওড়িশাতেও নবীন পটনায়েকের দুর্গ অক্ষত আছে।

পশ্চিমবাংলায় সিপিএম ও কমিউনিস্ট পার্টি উড়ে চলে গেছে। তাদের অপশাসন, গুণ্ডাবাজি ও প্রাচীনপন্থী, পুঁজিবিরোধী অপশাসনের ফলে তৃণমূল এসেছিলো। এখন তৃণমূলের চরম অশিক্ষা, অপশাসন ও দুর্নীতির ফলে বিজেপির ক্ষমতায় আসা শুধু সময়ের অপেক্ষা।

বাংলায় বিজেপি রাজ্য সরকার! দুবার কি তিনবার কথাটা নিজের মনে মনে উচ্চারণ করে দেখুন, কেমন লাগে।
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ধন্যবাদ কংগ্রেস পার্টি ও গান্ধী পরিবারকে, আপনাদের‌ দীর্ঘদিনের অপশাসন, অক্ষমতা, মিথ্যে প্রতিশ্রুতিকে। আপনাদের পারিবারিক রাজতন্ত্রকে।

ধন্যবাদ কমিউনিস্ট পার্টি, আপনাদের সীমাহীন ঔদ্ধত্য আর গুন্ডাবাজীর রাজনীতিকে।পশ্চিমবঙ্গকে উচ্চমেধা থেকে নিম্নমেধা করে তোলার অসীম ক্ষমতাকে।

আর পশ্চিমবঙ্গ নামক একসময়ের উদারপন্থী, প্রগতিশীল রাজ্যে খাল কেটে কুমির আসার রাস্তা তৈরী করে দেওয়ার জন্যে ধন্যবাদ তৃণমূল‌ কংগ্রেসকে।
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আমার প্রিয় দুই দেশ ভারত — আমার জন্মস্থান, যেখানে আমি জন্মেছি, বড় হয়েছি, বাংলা ভাষা, গান, মানুষ কে ভালোবাসতে শিখেছি, আর আমেরিকা — কর্মস্থান, যেখানে আমার বাকী জীবন কাটছে, বাকী জীবনটা আমি এই দুটো দেশেই ফ্যাসিস্ট শাসকদের অধীনে কাটাব।

এই দুই দেশে থাকা আমার পরিবার পরিজন, সন্তান, হাজার বন্ধুবান্ধব সবাই এই প্রগৈতিহাসিক‌ মানসিকতার রেসিস্ট, সেক্সিস্ট শাসকদের ঠিক করে দেওয়া নিয়মকানুন মেনে চলতে বাধ্য হবে।

‌‌ “প্রিয়, ফুল খেলবার দিন নয় অদ্য
ধ্বংসের মুখোমুখি আমরা
চোখে আর স্বপ্নের নেই নীল মদ্য
কাঠফাটা রোদে সেঁকে চামড়া।”

আমি নিশ্চিত, এখন আবার হিটলার, মুসোলিনি, ফ্রাঙ্কো, কু ক্লাক্স ক্ল্যানের দিন সমাসন্ন। নিষ্ঠুর,অন্ধকার শক্তিরা‌ আমাদের গ্রাস করতে আসছে। আবারও সারা পৃথিবী জুড়ে যুদ্ধ, রক্তক্ষয়, হিংসার আবহ তৈরী হবে।

এর সাথে যোগ হবে বিপজ্জনক হারে জলবায়ুর পরিবর্তন, মানুষের মৃত্যু, ভয়ানক দারিদ্র্য, রোগ ও দূর্ভিক্ষ। ভারতে ও বাংলায় মুসলমান, দলিত ও মেয়েদের ওপর নির্মম অত্যাচার নেমে আসবে ঘরে ও বাইরে।

রবীন্দ্রনাথ ইতিহাস হবেন।
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এই অন্ধকারের মধ্যে আমি আমার‌ সীমিত ক্ষমতায় মানুষকে যুক্তি দিয়ে বুদ্ধি দিয়ে বিশ্লেষণ করার শিক্ষা দিয়ে যাওয়ার কাজ করে যাব যতটুকু পারি। আর কীই বা করা আমার পক্ষে সম্ভব? আমার না আছে মিলিয়ন ডলার, আর না আছে উচ্চ বংশলতিকা। রিচ বা ফেমাস — কোনোটাই আমি নই।

যদি আপনারা চান, ভয় কাটিয়ে উঠতে পারেন, তাহলে এই হতাশা, বিহ্বলতা এসব দূরে সরিয়ে এই কঠিন সময়ে আমার পাশে থাকুন। না, আপনাদের সব প্রশ্নের উত্তর বা সব‌ সমস্যার সমাধান দেবার ক্ষমতা আমার নেই। কিন্তু আমি কথা দিচ্ছি, আমরা একসাথে মিলে কোন একটা রাস্তা ঠিক খুঁজে বের‌ করতে পারব।

হ্যাঁ, এবারে ওরা বিরোধীদের ধ্বংস করবে, মানুষের মনে নতুন করে আতঙ্ক তৈরী করবে। আমাদের‌‌ অনেকে ওদের‌ সাথে হাত মেলাবে। প্রগতিশীল, ধর্মনিরপেক্ষ কলকাতা, পশ্চিমবঙ্গও‌ আর কয়েক বছর পর‌ ওদের‌ দখলে চলে যাবে। এসবই সত্যি।

কিন্তু, খুব শিগ্গিরি সাধারণ মানুষ, ৯৯%, যারা তাদের ভোট দিয়ে জিতিয়েছে, নিজেদের ভুল‌ বুঝতে পারবে, তাদের বাস্তব জীবনের সংকটের কথা বুঝতে পারবে। সেই চরম বিপদের সময় তাদের যদি সাহায্যের প্রয়োজন হয়, তখন যেন আমরা তাদের পাশে দাঁড়ানোর জন্যে তৈরী থাকি।

এখনকার মত শুধু এইটুকু মনে রাখুন, যে একদল “দেশভক্ত,” যারা ভারতের স্বাধীনতা আন্দোলনে অংশগ্রহণ করেনি, একফোঁটা রক্তও দেয়নি, যারা গান্ধী, রবীন্দ্রনাথ, আম্বেদকরকে চিরকাল ঘৃণা করে এসেছে, বিদ্যাসাগরের মূর্তি ভেঙেছে, আর নাথুরাম গডসের মূর্তি গড়েছে, তারাই আজ দেশের দায়িত্বে।

হয়ত,আমাদের বাকী জীবনটা তাদের অধীনেই কাটাতে হবে।

যোগাযোগ রাখুন।
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ডঃ পার্থ বন্দ্যোপাধ্যায়
নিউ ইয়র্ক