A Day After the 2019 India Polls

Dr. Partha Banerjee from New York predicts ominous predictions about the upcoming 2019 national elections in India. Climate change, war, violence, terrorism, skyrocketed prices of health, education, transportation, medicines, and slashing of interests on people’s savings would make life miserable. Democracy will be killed once and for all. He wishes his predictions are all wrong. But…are they?

Some very possible outcomes. No, these are not meant for the Bhakts — religious zealots. It’s for commoners.

What can happen a day after the 2019 polls?

Possible Outcome (1) —  Cost of meds, oil, gas, education, transportation etc. will skyrocket [again!]. And, on the other side, bank interest rates will plummet. Something like the present day USA. We get 0.5% to 0.75% interest at the banks here in America. Nobody knows or cares. Thanks to the IMF and the World Bank, the Modi government, along with their cronies from the Adanis and Ambanis, is forcefully implementing this anti-people American model on us. And will continue to do so. The interest rates from the banks have already gone down a lot. Earlier, the Indian rates used to be 6.5 or 7% that have now gone down to 5 or 4.5%. As a result, the savings of millions are going down the drain. Retired women, Indian soldiers (Yes! They too!), and all other senior citizens, who totally rely on their savings, might very possibly see their income dip drastically from 15k to 14/12k. The numbers are mere examples only.


Such will be the price rise, that they won’t be able to sustain a living out of it. Violence will increase in the social spheres, because of economic reasons, and just like the USA, the police, military and private jails will take up law into their own hands. Just like the USA.

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पुलवामा, आतंकवाद के खिलाफ लड़ी गयी जंग, और नफरत की राजनीति – २

https://humanitycollege.org/2019/03/11/pulwama-and-the-war-on-terror-part-1/ — इस आर्टिकल के बाद दूसरा नंबर।

हमारा बदला पूरा हो जाए तो मैं कुछ सवाल आप सबसे पूछना चाहूंगा। मुझे उम्मीद है आप सब मुझे वो मौका देंगे।

मैं जिन बातों को आपके सामने लाना चाहता हूँ, वो इस प्रकार है:

प्रश्न 1 – जहाँ हर वक्त इतनी कड़ी सुरक्षा व्यवस्था होती हैं, जहाँ एक परिंदा भी पर नहीं मार सकती, उस मैक्सिमम सेक्युयरिटी ज़ोन में आतंकवादी बम से भरा हुआ ट्रक लेकर आते हैं और धमाका करके अत्याधुनिक हथियारों से लैस हमारे ४० से ज़्यादा सैनिकों को मार डालते हैं। पर कैसे? सवाल यह है जहाँ कुछएक किलोमीटर के दायरे पे और भी सेना छावनियां है, वहां ३०० किलो आईइडी लेकर जैश के आंकवादी उस संवेदनशील छेत्र में घुसे कैसे? क्या इसकी कोई निष्पक्ष जांच होगी? इस भयानक मौत के लिए कौन जिम्मेदार है? इन बेकसूर सैनिकों के नरसंहार के लिए जो भी जिम्मेदार है, क्या उसकी पहचान की जाएगी?

प्रश्न 2 – क्या अब तक किसी जनरल, कर्नल, मंत्री या सुरक्षा अधिकारी इस लापरवाही के लिए खुद को दोषी मानते हुए इस्तीफा दिया है? नहीं ना। हांलाकि, हम जानते है अगर बैंक में कभी डाका पड़ जाये और वहां की तिजोरी लूट ली जाये तो वहां के शाखा प्रबंधक को इसका खामियाजा भुगतना पड़ता है, लापरवाही के लिए उनकी नौकरी भी जा सकती है। कॉर्पोरेट दुनिया में भी विफलता की जिम्मेदारी लेनी पड़ती है। और फिर हमारी सरकार तो अमेरिका के कॉर्पोरेट मॉडल पर ही चल रही है। फिर यहाँ उनका यह नियम लागू क्यों नहीं होगा?

प्रश्न 3 – सुनने में आया है की खुफिया विभाग को इस हमले की खबर पहले से थी। फिर भी, सुरक्षा विभाग से इतनी बड़ी खामी कैसे रह गई? क्या किसी ने इसे जानबूझकर, सुनिश्चित तरीके से होने दिया? अगर सच में ऐसा है तो वे कौन लोग है? क्या उन्हें ढूंढ निकलना इतना मुश्किल है?

प्रश्न 4 – चलिए मान लेते हैं भारतीय सेना और वायु सेना एकसाथ मिलकर पाकिस्तान में घुस कर उनके सभी आतंकवादी ठिकानों पर बम बरसाकर उन्हें नष्ट कर देती है, जो अंतर्राष्ट्रीय कानून के नज़रिए से देखा जाये तो गलत है। क्यूँकि कोई भी देश किसी दूसरे देश में अंतरार्ष्ट्रीय स्तर पर अनुमति के बगैर नहीं घुस सकता, एकतरफा बमबारी नहीं कर सकता और उसकी संप्रभुता को नष्ट नहीं कर सकता। ऐसा करना अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर असंवैधानिक और गैर कानूनी होगा। हालाँकि, पूरे विश्व के विरोध को नज़रअंदाज़ करके किसी दूसरे देश में बमबारी और नरसंहार कैसे किया जाये यह तो अमेरिका ने ही हमें सिखाया है। इसका सबसे बड़ा उदहारण है इराक, वियतनाम और सीरिया। फिर तो हम भी दो चार ऐसे छोटे -मोटे हमले कर ही सकते है। लेकिन सवाल ये उठता है की क्या केंद्र सरकार हमारे देश की भविष्य के सुरक्षा सुनिश्चित कर पायेगी? ऐसा कदम उठाने पर भविष्य में कोई दूसरा आतंकवादी हमला नहीं होने का आश्वासन क्या मोदी सरकार हमें दे पायेगी?

प्रश्न 5 – आज के इस दौर में जहाँ हम अपनी रोज़मर्रा के ज़िन्दगी में छोटी से छोटी चीज़ें भी बिना गारंटी के नहीं लेते, चाहे वो सिलाई मशीन हो या गाड़ी; वहीं हम बिना गारंटी के बमबारी और उसके पीछे होने वाले रुपये की बर्बादी को कैसे खरीदेंगे?

[Our second Hindi article on India-Pakistan terror, politics of hate and violence, and some important questions on the eve of national elections. Hope you read and share. This is part 2 of a long article I wrote. Moly Mukherjee Gupta from Southampton, U.K. translated into Hindi.]


(जारी। कृपया वापस आ जाओ।)

पुलवामा, और आतंकवाद के खिलाफ लड़ी गयी जंग – १

मान लीजिए, आतंकवाद के खिलाफ लड़ी गयी जंग में भारत को पाकिस्तान के आतंकवादी ठिकानों को तबाह करने में कामयाबी मिल जाती है।

फिर आगे क्या? क्या मैं कुछ सवाल आपसे पूछ सकता हूँ?

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मेरे दोस्त और मुझे जानने वाले लोग ही आज मुझे पाकिस्तानी और गद्दार कहके पुकार रहे हैं। वे मुझसे नाराज़ हैं। उनका कहना हैं की देश की इस कठिन परिस्थिति में मैं युद्ध के खिलाफ बात करके भारत के शत्रु की भांति आचरण कर रहा हूँ। उनका अपना ही आज उनके नज़रों में ‘’घर का भेदी’’ और ‘’दुश्मन’’ बन गया है। कल तक जो मेरे इतने करीब थे आज वे ही मुझे सबक सिखाने की बात करने लगे हैं।

गलती मेरी ही हैं। मैं विश्व में होने वाले समस्त घटनाओं के जानकार, सर्वज्ञानी तो हूँ नहीं, जिसे सब पता हो। फिर क्या ज़रुरत थी ऐसे मामलों में मुझे कुछ कहने की? आजकल तो राह चलते भी डरने लगा हूँ, न जाने कब किससे मार खा जाऊँ!

किसी भी परिस्थिति में मैं अपने आपको युद्ध-विरोधी ही पाता हूँ। इसके बावजूद, पाकिस्तान के साथ भारत के बिगड़ते रिश्ते में मैंने खुद को भाजपा की नीतियों के समर्थन में पाया। हांलांकि मैं पाकिस्तान के उन तमाम आतंकवादी ठिकानों में बम फेंके जाने के भाजपा के इस फैसले से पूरी तरह सहमत नहीं हूं, लेकिन केवल उनकी देशभक्ति का सम्मान करने के लिए मैंने अपनी युद्ध-विरोधी सोच को युद्ध-परस्त सोच में तब्दील कर दिया। चलिए आज इन दोनों देशों में एक युद्ध हो जाने देते हैं। उनके समस्त आतंकवादी ठिकानों पर ताबड़तोड़  बम बरसाकर उन्हें ध्वस्त कर डालते हैं जिससे जैश के साथ-साथ जितने भी दूसरे चरमपंथी संगठन हैं उन्हें कड़ा से कड़ा सबक मिल सके।

अपने पिछले लेख में मैंने पुलवामा हमले में अपने देश के शहीद सैनिकों को श्रद्धांजलि देते हुए उन पर हुए इस कायरतापूर्ण हमले कि कड़ी निंदा की थी। उससे पहले मैंने कभी खुद को इतना ज़्यादा दुःखी, लाचार और बेबस नहीं पाया था। उस लेख में अपनी इस भावना को मैं आपके साथ साझा कर चुका हूँ। अपने बहादुर जवानों कि शहादत को हम बेकार नहीं जाने देंगे। खून के बदले खून चाहिए। और उस नज़रिये से देखा जाये तो पाकिस्तान में बसे सभी आतंकी शिविरों को तबाह करने का नतीजा भी अच्छा ही होगा।

पार्थ बनर्जी.

ब्रुकलिन, न्यू यॉर्क

Translated by: Moly Mukherjee Gupta, Southampton, U.K.

International Women’s Day — Filth in USA, Farce in India.

Nirbhaya and Asifa — two shames, two tears — out of many.

Never before in modern history, women have been in such great peril in my two countries — USA and India. Here in U.S., Trump and his cohort are obscenely anti-women. Their filth, glorified in a section of American media, makes you throw up. India, under this fanatic group of rulers, is ranked “the most dangerous place for women.” Lowest safety in the whole world.

Globally, India is #1 from the bottom, and USA is #10.

Especially after a dignified president like Obama, Trump’s misogyny and obscene public gestures against women are unbelievable! People who support him, I wonder, what do their sisters and wives think of him? I would like to know. I mean, do they really know? Can they think?

My real shame, however, is today’s India. From bride burning to dowry deaths to acid throwing to female infanticide to 24/7 rapes and tortures to eve teasing to economic discrimination to snatching their money and property to domestic violence to day-to-day harassment and undermining and subjugation, it is a place nowhere else to be found.

India’s New Rulers Don’t Understand Equality.

If you think these Indian rulers’ election politics of hate, violence and war against Pakistan would uplift women of India, you need to know their long history of misogyny. And for me, I have a number of first hand experiences.

If there is a ranking system, I would say they consider rich Hindu women as second-class citizens, poor Hindu women as third class, and Muslim and Dalit women as fourth class. They live in pre-historic days, and want women to surrender to men, period. Some of their leaders still support Suttee — the immolation of widows.

Of course, they are not the only ones to blame. Fanatic Muslims in India, Pakistan and Bangladesh share their share of misogyny and primitive social dictates. Between these two major religions with their extremist social leaders, International Women Day is a farce in India.

Let us face the truth, although elite and privileged women doing their annual, fancy window dressing today would fiercely debate. Let them debate. They live in fantasyland.

General Knowledge India — 2-minute Lesson on BJP and RSS.

(1) Who is Prime Minister Modi?

He is BJP and RSS.

(2) What is BJP?

It’s the political wing of RSS.

(3) What is RSS?

It’s a militant Hindu fundamentalist organization.

(4) What did they do?

Nathuram Godse, an RSS follower, killed Gandhi. He had many other Hindu fundamentalist associates on the assassination conspiracy.

Their top leaders praised Hitler, and their volunteers/followers conspired to kill Mahatma Gandhi. (Read New York Times interview with Gopal Godse, assassin Nathuram Godse’s brother.)

(5) Did RSS participate in the freedom struggle against British occupation and tyranny?

No, RSS as an organization actively stayed away from it.

(6) What are they against?

They always talked about Islam, Christianity, and socialism to be the three vices, or evils — for India or Bharat.

(7) What are they for?

India/Bharat is for Hindus and Hindi, gender equality is unacceptable, and the economy must be privatized (or, not socialized — they were vehemently against nationalization of India’s banks).

(8) Do RSS practice a democratic leadership structure?

No, they have a supreme, unquestionable leader.

(9) Do they have money?

They have huge money.

(10) How do they gather money?

Volunteer donation is one way. They call it GuruDakshina (charity to the Guru, which is their saffron, Hindu flag).

(11) Do they pay taxes on their enormous income this way?

Not sure. I guess, short answer is, if you can count the money correctly, and transparently. I never heard anybody asking this question. Nobody asks serious questions there.

(Reference: Partha Banerjee, In the Belly of the Beast: Hindu Supremacist RSS and BJP of India — An Insider’s Story. Ajanta Books International, Delhi, 1998).

ধরা যাক, সন্ত্রাসের বিরুদ্ধে যুদ্ধ হলো। পাকিস্তানে শত্রুকে গুঁড়িয়ে দিলাম আমরা। তারপর কী? কয়েকটা প্রশ্ন করা চলবে?

Can we condemn terror from Pakistan into India, and after supporting a bombing campaign inside Pakistan to destroy terrorist camps, ask some important questions — especially to those who call me anti-India traitor, or at least unpatriotic? Please answer my ten questions.


আমার বন্ধুরাই আমাকে পাকিস্তানী বলছে। দেশদ্রোহী বলছে। বলছে আমি নাকি দেশের এই সংকটে যুদ্ধের বিরুদ্ধে কথা বলে ভারতের শত্রুর মতো আচরণ করছি। আমি নাকি একজন “enemy within” বা ঘরের শত্রু। আমাদের মতো লোকদের আগে শায়েস্তা করা দরকার। 
তাই আমি ভেবে দেখলাম, আমি খুব অন্যায় করছি। এমন তো নয় যে আমি সবজান্তা, আর কেউ কিছু জানেনা। আমিই একমাত্র ইতিহাস পড়েছি, আর কেউ পড়েনি। আমিই একমাত্র খাঁটি দেশপ্রেমিক, আর সবাই ইডিয়েট। তাছাড়া, ভয়ও আছে, কে কোথায় রাস্তায় ধরে ধোলাই দেবে। কী দরকার?

তারপর ধরুন, প্রত্যেকের প্রতিই আমার শ্রদ্ধা আছে। আমি সম্মান দিতে জানি মানুষকে। সুতরাং, যুদ্ধের পক্ষে, পাকিস্তানের ভিতরে ঢুকে বোমা ফেলার বিজেপি সিদ্ধান্তের স্বপক্ষে আমি সম্পূর্ণ সহমত না হলেও, শুধুমাত্র তাদের দেশপ্রেমকে সম্মান জানানোর জন্যে — ধরা যাক, আমি আমার যুদ্ধবিরোধী অবস্থান আজকের জন্যে পরিবর্তন করলাম। হোক যুদ্ধ, হোক বোমাবর্ষণ। সন্ত্রাসীদের ঘাঁটিগুলো ভেঙে গুঁড়িয়ে দাও। জৈশ আর যারা যারা আছে, উড়িয়ে দাও তাদের সব কটাকে। 

পুলওয়ামার শহীদ সেনাদের জন্যে আমার যে কৃতজ্ঞতা, তা আমি আগেও লিখেছি। তাদের মৃত্যু যেন ব্যর্থ না হয়। রক্তের বদলে রক্ত চাই। ধরা যাক, ভালোই হবে। 

এসব প্রতিশোধ নেওয়া হয়ে গেলে, তারপরে আমি কতগুলো প্রশ্ন করতে পারি কি? আশাকরি, আমার ওই বন্ধুরা আমাকে সে সুযোগ দেবে। 

যদি দেয়, তাহলে আমি এই কথাগুলো বলবো। 

ওরা যদি উত্তর না দেয়, আপনারা দিন। বা, আমার থেকে যারা অনেক বেশি জানে, তাদের বলুন উত্তর দিতে। 

হাজার হোক, আমি সামান্য মানুষ। কীই বা জানি এসব বিশাল বিশাল ব্যাপারের?___________________________

প্রশ্ন ১ — ম্যাক্সিমাম সিকিউরিটি জোন, যেখানে মাছি গলেনা, সেখানে সন্ত্রাসীরা ট্রাক বোমা নিয়ে এসে পঁয়তাল্লিশ জন অস্ত্রধারী, ট্রেনিং নেওয়া সৈনিককে উড়িয়ে দিলো কী করে? তার কোনো নিরপেক্ষ তদন্ত হবে কি? কে দায়ী এই ভয়াবহ মৃত্যুর জন্যে, এই সৈনিকদের গণহত্যার জন্যে, তার সনাক্তকরণ হবে কি? 

প্রশ্ন ২ — এখনো পর্যন্ত এই বিশাল নিরাপত্তা গাফিলতির জন্যে কোনো জেনারেল, কর্ণেল, মন্ত্রী বা নিরাপত্তা অফিসার পদত্যাগ করেছে কি? কোনো ব্যাংকের ভল্টে  যদি ডাকাতি হয়, নিরাপত্তার দায়িত্বে থাকা অফিসার বা ব্যাংক ম্যানেজার যার কাছে সিকিউরিটির চাবিকাঠি থাকে, তার চাকরি যায়। কারণ তারা ডাকাতি বন্ধ করতে ব্যর্থ হয়েছে। ব্যর্থতার দায়িত্ব কর্পোরেট জগতে নিতেই হয়। আর এখন তো সরকার চলছে কর্পোরেট আমেরিকার মডেলে। তাহলে, এখানে তা হবেনা কেন? 

প্রশ্ন ৩ — শুনেছি, আগেই নাকি খবর এসেছিলো, সন্ত্রাসী হামলা হতে চলেছে। তারপরেও নিরাপত্তায় এতো বড় গর্ত থেকে গেলো কীভাবে? কেউ বা কারা কি ইচ্ছাকৃতভাবে এই সন্ত্রাস যাতে হয়, তা সুনিশ্চিত করেছে? তারা কারা? তাদের খুঁজে বের করা কি এতই অসম্ভব?

প্রশ্ন ৪ — আচ্ছা, ধরা যাক, ভারতের মিলিটারি ও এয়ার ফোর্স পাকিস্তানে ঢুকে জঙ্গি ঘাঁটি গুঁড়িয়ে দিলো। যদিও, আন্তর্জাতিক আইন বলেছে, একতরফাভাবে কোনো দেশের সীমারেখার মধ্যে ঢুকে বোমাবর্ষণ করা — কোনো আন্তর্জাতিক আলোচনা ছাড়াই — সে দেশের সার্বভৌমত্ব (sovereignty) ধ্বংস করে, যা আন্তর্জাতিক আইনবিরুদ্ধ কাজ। যাই হোক, আমেরিকা আমাদের শিখিয়েছে, কীভাবে সারা পৃথিবীর বিরোধিতার তোয়াক্কা না করে একতরফাভাবে যুদ্ধ, বোমাবর্ষণ ও গণহত্যা করা যায়। ইরাক, ভিয়েতনাম, এখন সিরিয়া। সুতরাং, নিশ্চয়ই করা যায়। ধরে নিলাম। তাহলে, মোদী ও তাঁরা সরকার আমাদের দেশের ভবিষ্যৎ নিরাপত্তা নিশ্চিত করতে পারবে কি? তারা কি গ্যারান্টি দেবে, আর কখনো এ ধরণের সন্ত্রাসী হামলা হবেনা?

প্রশ্ন ৫ — গ্যারান্টি ছাড়া একটা গাড়িও যখন আমরা কিনিনা, এমনকি একটা সেলাই মেশিন, তাহলে গ্যারান্টি ছাড়া আমরা যুদ্ধ ও বোমাবর্ষণ ও তার পিছনে যে বিশাল অংকের অর্থব্যয়, তা কিনবো কী করে? এই কর্পোরেট সিস্টেমে নির্বাচন তো এখন বৃহত্তম মল, সুপারমার্কেট। 

প্রশ্ন ৬ — এই যুদ্ধের পরে কি কাশ্মীর সমস্যার স্থায়ী কোনো সমাধান খুঁজে বের করা হবে? আমেরিকা ও সৌদি আরব জাতীয় দেশগুলো — যারা পাকিস্তানকে চিরকাল অস্ত্র ও অর্থসাহায্য করে এসেছে, এবং আজকেও করছে (সৌদি ক্রাউন প্রিন্স গত সপ্তাহেই পাকিস্তানে ও ভারতে ভ্রমণ করেছেন, এবং বিশাল অর্থসাহায্যের প্রতিশ্রুতি দিয়েছেন পাকিস্তানকে) — তাদের কি এই সমাধান আলোচনায় সামিল করা হবে? কারণ, কাশ্মীরের এই জটিলতা এবারে একেবারেই শেষ করা দরকার। 

প্রশ্ন ৭ — পাকিস্তানকে সম্পূর্ণ ধ্বংস করে দিলে কি সন্ত্রাস ও কাশ্মীর সমস্যার স্থায়ী সমাধান হবে? ধরা যাক, বিজেপি ও আর এস এস তো চিরকালই চেয়ে এসেছে পাকিস্তানের ধ্বংস। যদি তর্কের খাতিরে ধরে নিই, আমরা পাকিস্তানকে ধ্বংস করে দিলাম একেবারে। তাহলে কি পাকিস্তানী শিশু এবং কয়েক কোটি মানুষের সীমান্ত পার হয়ে ভারতে আসা বন্ধ হবে? তাদের প্রতিহিংসার ও প্রতিশোধের আগুন কি নিভে যাবে? অন্য দেশের সন্ত্রাসীরা কি তখন আরো বেশি করে ভারতের ওপর নানাভাবে সাবোটাজ ও সন্ত্রাসী হামলা চালাবে না? তার গ্যারান্টি কি মোদী ও আর এস এস সরকার দিতে পারবে?

প্রশ্ন ৮ — এই সমস্ত যুদ্ধ ও সন্ত্রাস দমনের কাজ শেষ হলে ভারতের অর্থনৈতিক সংকট, দুর্নীতি, জনবিস্ফোরণ, পরিবেশ ও জলবায়ু সংকট, ভয়াবহ কৃষি ও বেকার সমস্যা, রাফায়েল চক্রান্ত, নীরব মোদী-বিজয় মাল্য-আম্বানি জাতীয় অতি বিশাল মাপের দুর্নীতি ও স্ক্যাণ্ডাল মোদী সরকার কি মোকাবিলা করবে অনতিবিলম্বে? 

প্রশ্ন ৯ — যুদ্ধ ও সন্ত্রাস দমন হয়ে গেলে মোদী ও বিজেপি সরকার কি সরকারি ব্যাঙ্ক, শিল্প, ইন্স্যুরেন্স, শিক্ষা, স্বাস্থ্য এবং পরিবহন — এসব সেক্টরকে সম্পূর্ণ বেসরকারিকরণ করে ফেলবে? এক ডলারে এখন ৭২ টাকা। এবারে কি তা আই এম এফ ও বিশ্ব ব্যাংকের নির্দেশে ৮০ বা ৮৫ টাকা হয়ে যাবে? জিনিসপত্রের দাম, তেলের দাম, পরিবহণ, মেডিকেল, শিক্ষা — এসবের খরচ কি আরো অনেক বেড়ে যাবে? 

প্রশ্ন ১০ — এবারের নির্বাচনে জয়লাভ করলে মোদী ও বিজেপি এবং আর এস এস কি ভারতের সংবিধানকে সম্পূর্ণভাবে বদলে ফেলবে, যাতে রাজনৈতিক বিরোধিতাকে প্রকাশ্যেই দেশদ্রোহিতা বলে ঘোষণা করা যায়, এবং রাজনৈতিক বিরোধীদের দেশদ্রোহিতার দোষে সাংবিধানিকভাবে শাস্তি দেওয়া যায়?

উত্তরের অপেক্ষায় থাকবো। আপনাদের সকলকে উত্তর খুঁজে বের করার জন্যে প্রেরণা, উদ্দীপনা ও উৎসাহ দিতে থাকবো। 

ভারত মাতা কি জয়। জয় হিন্দ। বন্দে মাতরম। 
_________________
ব্রুকলিন, নিউ ইয়র্ক 
২৬শে ফেব্রুয়ারি, ২০১৯ 

রবীন্দ্রনাথ ও বাংলা ভাষার অবলুপ্তি।

ফেব্রুয়ারি মাস ভাষা দিবসের মাস। বাংলা ভাষার সম্মান রক্ষার জন্যে যে শহীদরা প্রাণ দিয়েছেন, তাঁদের স্মরণ করবার মাস। ২১শে ফেব্রুয়ারির মাস। সেই উপলক্ষ্যেই এই বিশেষ রচনা।

এই তেত্রিশ বছর আমেরিকায় থাকার পরে বাংলা বর্ণমালা আমার মনে থেরাপির কাজ করে। আর পশ্চিমবাংলায়, কলকাতায় এখন বাংলা বর্ণমালা ঠিকমতো বলতে পারে, এমন ছেলেমেয়ের সংখ্যা হাতে গোণা যায়। বানান বা ব্যাকরণের কথা তো আর তুললামই না। সেটা একটা স্ক্যান্ডালে পরিণত হয়েছে এখন। কিন্তু, তার জন্যে নতুন প্রজন্মকে দোষ দিয়ে লাভ নেই। আমরা তাদের শেখাইনি। বাংলা ভাষার প্রতি গর্ব অনুভব করিনি কখনো তেমন করে। বাংলা ভাষার হাজার বছরের গৌরবোজ্জ্বল ইতিহাস আমরা তাদের পড়াইনি। এখন দুই বাংলাতেই দেখি, ভুল বানানে বাংলা লেখা হয়। এবং, সেসব লেখা সোশ্যাল মিডিয়াতে বাহবাও পায়।

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Liaisons with Language

by Samyabrata Roy

Historically speaking, the Bhasha Andolôn or the Bengali Language movement was a political movement fighting for the recognition of Bengali as an official language of the then Pakistan controlled Bangladesh, the events of which culminated in 21st February 1952. But, in 2019, the Bengali language has a rather curious position in society.

Protesters in the Language Movemtent of 1952 / sourece: abac-bd.com
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‘म्युजिक बॉक्स एंड मूनशाइन’ के लोकार्पण के सिलसिले में

मानवाधिकारों के लिए समर्पित एक भारतीय-अमेरिकी लेखक पार्थ बनर्जी से मुलाकात

डॉ पार्थ बनर्जी, मानवाधिकार कार्यकर्ता, लेखक, शिक्षक, मीडिया समीक्षक और संगीतकार हैं. कोलकाता में पले-बढ़े, पर कुछ दशकों से अमेरिका में रह रहे हैं. बंगला कहानियों के अपने अंग्रेजी में छपे संकलन ‘म्युजिक बॉक्स एंड मूनशाइन’ के लोकार्पण के सिलसिले में जब वह दिल्ली में थे, तो साहित्य आजतक ने उनसे बातचीत की.

डॉ पार्थ बनर्जी, भारतीय अमेरिकी लेखक – मानवाधिकार कार्यकर्ता

जय प्रकाश पाण्डेय 

https://aajtak.intoday.in/story/dr-partha-banerjee-interview-on-his-new-book-musicbox-and-moonshine-1-1062644.html

नई दिल्ली, 19 फरवरी 2019, अपडेटेड 20 फरवरी 2019 12:50 IST

पार्थ बनर्जी…परिचय जानने के लिए गूगल पर सर्च करने पर कई पेज खुलते हैं. इंटरनेट पर इस नाम के लोगों की भरमार है. इसमें से कई लोग तो अमेरिका में भी रहते हैं. पर जो पहला पेज खुलता है विकीपीडिया का, उसकी पहली पंक्ति कुछ इस तरह है. डॉ पार्थ बनर्जी, मानवाधिकार कार्यकर्ता, लेखक, शिक्षक, मीडिया समीक्षक और संगीतकार. कोलकाता में पले-बढ़े, अभी न्यूयॉर्क में रहते हैं और भारत की लगातार यात्राएं करते रहते हैं. इसके बाद उनका एक लंबा परिचय है.

पार्थ बनर्जी कोलकाता में पलेबढ़े. पिता जितेंद्र नाथ बनर्जी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के जमीनी कार्यकर्ता थे और उसकी राजनीतिक शाखा जनसंघ, जो अब भारतीय जनता पार्टी के रूप में देश पर शासन कर रही है, से जुड़े थे. पार्थ बनर्जी को पहली सियासी शिक्षा अपने पिता से ही मिली. बाद में अपने मामा बुद्धदेव भट्टाचार्जी के प्रभाव में वह कांग्रेस की तरफ झुके.

कॉलेज की शुरुआती पढ़ाई पूरी करने के बाद वह पश्चिम बंगाल के एक छोटे से गंवई स्कूल में चार साल तक पढ़ाया. बाद में साल 1985 में वह जैविक विज्ञान में शोध के लिए अमेरिका चले गए. वहीं उन्होंने इलीनॉयस स्टेट यूनिवर्सिटी से प्लांट बायोलॉजी में स्नातकोत्तर की दूसरी डिग्री हासिल की. साल 1992 में उन्होंने साउदर्न इलीनॉयस यूनिवर्सिटी से पीएचडी की डिग्री ली. इसके बाद वह एल्बनी में पोस्ट डॉक्टरल रिसर्च साइंटिस्ट के तौर पर काम करने लगे.

साल 1999 में डॉ पार्थ बनर्जी ने विज्ञान का अपना करियर छोड़ दिया और तीसरी मास्टर डिग्री के लिए कोलंबिया यूनिवर्सिटी के ग्रेजुएट स्कूल ऑफ जर्नलिज्म में दाखिला ले लिया. अमेरिकन मीडिया और एथिक्स की समझ के लिए यहां उन्हें प्रतिष्ठित सेवेलॉन ब्राउन अवार्ड से सम्मानित किया गया. यहीं से वह स्क्रिप्स हॉवर्ड फेलोशिप के तहत अन्य साथी छात्रों के साथ इजराइल, फिलिस्तीन और जॉर्डन गए, उस इलाके में धार्मिक व्यवहार के अध्ययन के लिए.

इस दौरान मीडिया में किए गए अपने योगदान के लिए वह इंडिपेंडेंट प्रेस असोसिएशन और इमीग्रेंट सेविंग बैंक अवार्ड से भी नवाजे गए. उन्होंने एबीसी, न्यूयॉर्क टाइम्स, सीएनएन, द प्रोग्रेसिव के अलावा भारत और बंगलादेश में भी कई पत्रपत्रिकाओं में लिखा. नोम चोमस्की के साथ उनका साक्षात्कार काफी चर्चित रहा.

पर मुख्यधारा की मीडिया में पूंजी के बढ़ते प्रभाव व दुनिया भर में विस्थापितों की सम्स्या को देखते हुए वह अध्यापन गतिविधियों की तरफ मुड़ गए. एक विज्ञान पत्रकार, सामाजिक लेखक, मानवाधिकार कार्यकर्ता, शिक्षक, श्रमिक अधिकारों के समर्थक और विस्थापन विषयों के विशेषज्ञ के रूप में उन्होंने दुनियाभर में अपनी पहचान बनाई है.

वह अंग्रेजी और बंगला के चर्चित लेखक हैं. उनके संस्मरण बंगला में घोटीकहिनी नाम से छपा. रवींद्र संगीत पर उनका अलबम भी आ चुका है. पार्थ बनर्जी अभी पिछले दिनों दिल्ली आए थे, अपनी बंगला कहानियों के अंग्रेजी में छपे संकलन ‘म्युजिक बॉक्स एंड मूनशाइन’ के लोकार्पण के सिलसिले में. इस किताब को रुब्रिक पब्लिशिंग ने छापा है और इसमें बंकिम चंद चट्टोपाध्याय से लेकर सुनील गांगुली तक कुल 18 सहित्यकारों की कहानियां हैं. साहित्य आजतक ने इस अवसर का लाभ उठाते हुए पार्थ बनर्जी से अनौपचारिक बातचीत की.

यह पूछे जाने पर कि विज्ञान, उद्योग, शिक्षा और अब साहित्य, आपने हर समय जीवन में अलग-अलग क्षेत्र चुने, कोई वजह? पार्थ बनर्जी का जवाब था कि हर उम्र व क्षेत्र में सीखने के कई मौके हैं. एक तरह से व्यापक शिक्षा के कई स्तर….अपने अनुभवों से मैं वर्तमान शिक्षा पद्धति में हर स्तर पर बदलाव का हिमायती हूं. अपने जीवन से मैंने उदाहरण प्रस्तुत करने की एक कोशिश की है.

यह पूछे जाने पर कि आप तो एक शिक्षाविद हैं. फिर आपको साहित्य से जुड़ने, वह भी बंगला कहानियों का संकलन कर उनके अंग्रेजी अनुवाद की आवश्यकता क्यों महसूस हुई. इसकी कोई खास वजह? पार्थ बनर्जी का त्वरित जवाब था क्योंकि मैं इस काम को साम्राज्यवाद विरोधी सांस्कृतिक प्रतिरोध आंदोलन कहता हूं. अगर मुझे हिंदी या तमिल भाषाओं की इतनी समझ होती तो मैं इन भाषाओं में भी यही काम करता.

इस सवाल पर कि आपका यह बंगला संकलन अब अंग्रेजी में भी है, आपको अपने इस संकलन  ‘म्युजिक बॉक्स एंड मूनशाइन’  की कहानियों में से किस लेखक की कौन सी कहानी अधिक पसंद आई? पार्थ बनर्जी का जवाब था,  यों तो सभी कहानियों की अपनी खासियत है, पर टैगोर की कहानी ‘एक पत्नी का पत्र’, विभूति भूषण बंदोपाध्याय की कहानी ‘पानी का झोंका’, सैयद मुज़्तबा अली की कहानी ‘नून पानी’ सबसे अच्छी लगीं.

बंगाल के अपने अनुभवों के बाद पार्थ बनर्जी अमेरिका के अपने अनुभवों पर भी एक किताब लिख रहे हैं. उनका मानना है कि जलवायु परिवर्तन, अंधाधुंध कमाई और संपत्ति संबंधी असमानताएं दुनिया के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती है, जिसके समाधान के लिए वैसे तो काफी देर हो चुकी है, फिर भी अगर मानवता और जीवन को बचाना है तो इस दिशा में तुरंत प्रयास किए जाने चाहिए..

आपके पास राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, वामपंथी संगठन, अमेरिका की पूंजीवादी नीतियों सहित नोम चोमस्की के काम का विस्तृत अनुभव है? आपकी नजर में दुनिया के सामने इस समय सबसे बड़ा खतरा क्या है? और क्या साहित्य के पास इसे सुलझाने की क्षमता है? पर उनका जवाब था दुनिया की सबसे बड़ी समस्या जलवायु परिवर्तन, संपत्ति असंतुलन और एकतरफा ऐतिहासिक आय है. इसका समाधान न ढूंढा गया तो दुनिया और मानव सभ्यता को विनष्ट होने से नहीं बचाया जा सकता.    

একজন প্রাক্তন আর এস এস এক্টিভিস্ট হিসেবে বিজেপি বন্ধুদের কাছে কিছু প্রশ্ন

 
— পর্ব ১ —
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অবশ্য আমার কথাগুলো বলছি যারা উত্তর দিতে চায়, তাদের কাছে। যারা কিছু পড়বেনা, ভাববেনা, আর খুন জখম হ্যাকিং ট্রোলিং রক্ত চাই এসব রাস্তায় যাবে, তাদের কাছে নয়।

আমি মনে করিনা, আর এস এস অথবা বিজেপি মানেই “রক্ত চাই”এর দল। আমি তাদের সেন্টিমেন্ট বুঝি। অন্ততঃ, দেশপ্রেম যে তাদেরও আছে, তা বুঝি। আশা করবো তারাও বুঝবে আমিও একজন দেশপ্রেমিক। এবং আমার মতো অনেকেই যারা পুলওয়ামা নিয়ে যুদ্ধ ও রক্ত চাইয়ের বিরুদ্ধে কথা বলছে, তারাও দেশপ্রেমিক।

কেউ দেশদ্রোহী নই আমরা। দেশের প্রতি, দেশের মানুষদের প্রতি, ঐতিহ্য ও ইতিহাসের প্রতি আমাদের গভীর শ্রদ্ধা আছে। আমি নিজেকে একজন হিন্দু বলেই মনে করি। আমি ধর্ম ও অধ্যাত্ম মানি। কিন্তু ধর্মের নামে ধর্মান্ধতা, ঘৃণা ও গোঁড়া রক্ষণশীলতার বিরোধী। দেশ ছেড়ে এসে অন্য দেশে থাকলেই বিদেশী হয়ে যায়না। সংঘ পরিবারের হাজার হাজার সদস্য ও সমর্থক আমেরিকা ও ইউরোপে থাকে। তারা কি সবাই বিদেশী?

আমি ইসলামিক সন্ত্রাসকে সন্ত্রাস বলি। সভ্যতার শত্রু বলে চিহ্নিত করি। আমি কম্যুনিজমকে সমর্থন করিনা। আমি কংগ্রেসি রাজনীতিকে চিরকাল ঘৃণা করে এসেছি। অথচ, কংগ্রেসের মধ্যেও আমার বহু কাছের মানুষ ছিল ও আছে। সেরকম বামপন্থী দলগুলোর মধ্যেও আমার খুব কাছের মানুষদের আমি দেখেছি সারাজীবন। তাদের ত্যাগ ও দেশপ্রেমকে আমি শ্রদ্ধা করে এসেছি সারাজীবন।

আমার অনেক বিজেপি ও আর এস এস বন্ধু আছে। তাদের অনেককে আমি চল্লিশ বছর, এমনকি পঞ্চাশ বছর ধরে চিনি। আমি যখন ছ বছর বয়েসের শিশু, তখন ওই শিশু স্বয়মসেবক হিসেবে আর এস এসে ঢুকেছিলাম স্বর্গীয় পিতৃদেব শ্রী জিতেন্দ্রনাথ বন্দ্যোপাধ্যায়ের হাত ধরে। জিতেন্দ্রনাথ ছিলেন সংঘ প্রচারক, এবং অটলবিহারী, আদভানির আজীবন বন্ধু। হিন্দুত্ববাদী নাথুরাম গডসে সাভারকার ইত্যাদি নেতাদের সাহায্যে গান্ধীহত্যা করার পরে যখন আর এস এস নিষিদ্ধ হয়, তখন আমার বাবা তিন বছরের মতো জেলে ছিলেন।

এই জেলে থাকার কারণে বাবা কখনো সরকারি চাকরি পাননি, এবং আমাদের সারাজীবন দারিদ্র্যের মধ্যে কাটাতে হয়েছে। আমার মা নিজে না খেয়ে তার খাবারটা আমাদের অনেক সময়ে দিয়ে দিতো। এবং, খুব কম বয়েসে ক্যানসারে মারা যায়। যাক, সেসব অন্য কথা। অন্য প্রসঙ্গ।

আমাদের বাড়িতে আর এস এসের বিরাট বিরাট সর্বভারতীয় নেতারা আসতেন।ভাউরাও দেওরাস, নানাজী দেশমুখ, একনাথ রাণাডে — এমনকি গুরু গোলওয়ালকার — আমাকে ব্যক্তিগতভাবে চিনতেন, এবং স্নেহ করতেন।

আমি ছ বছর বয়েস থেকে বাইশ বছর বয়েস পর্যন্ত আর এস এস করেছি। শিশু স্বয়মসেবক থেকে বালক, তারপর তরুণ, তারপর শিক্ষক, মুখ্যশিক্ষক। তারপর জনসঙ্ঘ দলের হয়ে দিল্লি — জনতা পার্টি তৈরী হওয়ার প্রথম জাতীয় সম্মেলনে। আমাকে অখিল ভারতীয় বিদ্যার্থী পরিষদের (এবিভিপি) পশ্চিমবঙ্গ সম্পাদক করা হয়েছিল। আমার অনেক বন্ধু সেসব দিনের কথা জানে। তাদের অনেকে এখন ফেসবুকেও আছে।

অদ্ভুত কথা হলো, তারা তখন আমার জনসঙ্ঘ, আর এস এস, এবিভিপি করা দেখে হাসতো। এখন তারা অনেকে হিন্দুত্ববাদীদের গোঁড়া সমর্থক। আর আমি চিরকালের মতো গোঁড়া হিন্দুত্ববাদী রাজনীতি ছেড়ে বেরিয়ে এসেছি।

কেন বেরিয়ে এলাম? সে অনেক কথা। আদর্শগত কারণেই বেরিয়ে এসেছি। আমি ঘৃণা, হিংসা, যুদ্ধবাদ ও সাম্প্রদায়িকতার রাজনীতিতে বিশ্বাস করিনা। আমি আমার দুটো বই — ইংরিজি বই In the Belly of the Beast এবং বাংলা স্মৃতিকথা ঘটিকাহিনি’তে বিশদভাবে লিখেছি। পারলে পড়ে নেবেন।

ইংরিজি বইটা আউট অফ প্রিন্ট, কিন্তু কিছু কিছু অংশ পাওয়া যায় অনলাইনে। ঘটিকাহিনি সবে দুবছর আগে বেরিয়েছে। দেজ পাবলিশিং, ধ্যানবিন্দু, এবং প্রকাশক রাবণ প্রকাশনাতে পেয়ে যাবেন।

পড়ুন। প্রশ্ন করুন। চ্যালেঞ্জ করুন আমাকে।

(পর্ব ২ লিখবো। আশা করি আপনাদের জানার উৎসাহ থাকবে।)