अमेरिका का असली चेहरा – जिसे कोई नहीं जानता

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The Green Book - Humanity College
Source: BlackEnterprise.com
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जातिवाद, ईशनिंदा और रंगभेद- जिन्हे भारत के निवासियों ने भी बड़ी जल्दी अपना लिया है

हाल ही में मैं ‘ ग्रीन बुक’ नामक एक अंग्रेजी फिल्म देखने गया था। कहानी इस प्रकार है :

डॉक्टर डॉन शर्ले एक अफ्रीकन-अमेरिकन क्लासिकल पियानिस्ट हैं, जिनके दोस्तों के लिस्ट में उस वक्त के मशहूर अटॉर्नी जनरल रॉबर्ट केनेडी जैसे लोग शामिल हैं। डॉक्टर शर्ले न्यू यॉर्क से अमेरिका के डीप साउथ में कॉन्सर्ट टूर पर जाना चाहते हैं और इस दौरान उनकी मुलाकात होती हैं इटली के एक श्वेत बार बाउंसर से जो बाद में एक ड्राइवर और अंगरक्षक बन जाता है। ये मुलाकात दोस्ती में बदल जाती हैं और वे वीनस के टूर पर निकल पड़ते हैं।

यह फिल्म एक श्वेत और अश्वेत, दो इंसानों के बीच रिश्ते की कहानी है। पर्दे पर अमेरिका के उस समय को दर्शाया गया है जब समाज में सामाजिक-आर्थिक भेदभाव और रंगभेद जैसी चीजें पनपी हुई थीं। प्रसिद्ध  संगीतकार होने के बावजूद, डॉक्टर शर्ले को केवल एक अश्वेत होने के कारण, उनके इंडिआना से केंटकी और लूईसीआना से मिसिसिपी  से गुज़रते हुए अलाबामा तक के सफर में कई कठिनाईओं का सामना करना पड़ा और इन्ही परिस्थितियों में दो भिन्न श्रेणी के लोग मिले और उनमें  दोस्ती हो गयी ।

मैं फिल्म देखते हुए दो बातें सोच रहा था।

एक, ये सिर्फ १९६२ के अमेरिका की कहानी नहीं है, ये तो आज की कहानी भी है। २०१८ साल में भी ये देश किस हद तक जातिवाद, ईशनिंदा और रंगभेद में डूबा हुआ है ये किसी से छुपा नहीं है। न्यूयॉर्क, शिकागो, लॉस एंजेलिस, बोस्टन जैसे कुछ उदार शहरों से बाहर निकलते ही ये वही पुराना १९६२ वाला अमेरिका बन जाता है जहाँ किसी भी वक्त किसी को भी पुलिस सिर्फ अश्वेत होने के कारण गाड़ी से उतार ले जा सकती है, उसे टॉर्चर कर सकती है या फिर उसे गोलीयो से भून सकती है। ८ से ८० साल तक के किसी भी अश्वेत पुरुष – अमेरिका में किसी दूसरे, तीसरे या फिर चौथे दर्जे के नागरिक से कम नहीं है। उसे किसी भी वक्त जेल हो सकती है या फिर जुर्माना किया जा सकता है। इतना ही नहीं, उसे क़त्ल या फिर बलात्कार करने का पूरा अधिकार भी राज्य के पास है। हाँ ये बात अलग है की ये सारे नियम आपको किसी कानून के अंतर्गत रूल बुक में लिखा नहीं मिलेगा, लेकिन ये हकीकत है।

नं २, दूसरी महत्वपूर्ण घटना है हाल ही में वहाँ गरीब अप्रवासियों के साथ राष्ट्रपति ट्रंप के निर्देश से कानूनी कार्रवाई के नाम पर हुए अत्याचार, जहाँ कई गैर नागरिकों या अवैध प्रवासियों को हिरासत में लिया गया और उन्हें उनके बच्चों से अलग कर दिया गया। माँ-बाप से अलग किये गए बच्चों को बड़े-बड़े पिंजरों में रखा गया जिसे लेकर विश्व भर में अमेरिकी सरकार एवं डोनाल्ड ट्रंप की खूब निंदा की गयी। इतना ही नहीं, मेक्सिको सीमा पार अवैध तरीके से देश में प्रवेश करने वालों के खिलाफ अलग-अलग कार्रवाई करते हुए बॉर्डर सिक्योरिटी के अमेरिकी सेना और उनके साथ तैनात उन तमाम डीप साउथ के राइफल और मशीन-गन लिए श्वेत श्रेष्ठतावादियों ने न जाने कितनों को गोली मार दी। ज्यादातर समय इन घटनाओं का विवरण वहां के सभ्य, शिक्षित, लिबरल और अभिजात वर्ग तक पहुंचती ही नहीं है।

कुछ समय पहले बांग्ला भाषा का समाचार पत्र आनंद बाजार पत्रिका में मैंने एक लेख लिखा था, जिसका टाइटिल था : ”ঘরে ঘরে বন্দুক, মনে মনে বিদ্বেষ” यानी अगर इसका हिंदी में अनुवाद करें तो अर्थ ये निकलता है- ”हर घर में बन्दुक और हर मन में द्वेष” । यह लेख मैंने सं 2014 में अमेरिका के मिसौरी प्रांत के फर्गुसन शहर में १८ साल के एक बेगुनाह अश्वेत युवक की पुलिस की गोली से मौत के विरोध में लिखा था। फर्गुसन और ऐसी गोलीबारी अमेरिका के कोने कोने में आपको मौजूद मिलेगा। यकीन न हो तो गूगल कर लीजिएगा। वो कहते है ना- ”एमोन देशटी कथाओ खुंजे पाबे ना को तुमि ..”

साथ में एंटी-ब्लैक रेसिस्म और हिंसा तो है ही। लेकिन इसके साथ एक नयी बात शुरू हुई है और वो है एंटी इमिग्रेंट रेसिस्म और उनसे हो रही हिंसा। ये फासीवाद या फासिस्टवाद को बनाये रखने का एक तरीका मात्र है। अमेरिका में ट्रम्प नामक राक्षस का उदय इसी द्वेष, घृणा और सार्वजनिक हिंसा को प्रोत्साहन मिलने से हुआ। इन सब के अलावा, अमेरिका जैसे देश में महिलाओं के लिए प्रतिकूल परिस्थिति का अविश्वसनीय तौर पे बढ़ना एक और चिन्ता का विषय बनता जा रहा है।

भारत में फ़ैसिस्टवाद कायम करने के लक्ष्य से भाजपा, आरएसएस, विश्व हिन्दू परिषद्, बजरंग दल और उनके सहयोगी शिव सेना इसी पथ पर द्रुत अग्रसर हो रहे हैं। अभी हाल ही ब्राजील और तुर्की में ऐसे ही कुछ कट्टरपंथी सत्ता में आये हैं। हद तो तब हो गयी जब ब्राजील के नए राष्ट्रपति चुने जाने के बाद बोल्सोनारो का महिला द्वेषी बयां सामने आया।  उनका कहना है, किसी परिवार में लड़की के जन्म का मतलब उस परिवार का कमज़ोर होना होता है। उन्होंने अमेज़न जंगलों के बारे में कहा की उन्हें काट डालना चाहिए और बदले में वहां विकास की जानी चाहिए। उन्होंने यहाँ तक कह डाला कि अमेज़न के जंगलों में रह रहे वहां के प्राचीन स्वदेशी जनजातियों के परिजनों का सफाया कर देना चाहिए।

भारत और ब्राजील जैसे तृतीय विश्व के देशों में अल्पसंख़्यकों, अप्रवासियों, महिलाओं और लैंगिक समानता के खिलाफ भेदभाव व्यापक स्तर पर बढ़ गया है। और कहीं न कहीं इसके लिए अमेरिका के बढ़ते नए और क्रूर फासीवाद ज़िम्मेदार है। इसलिए, आज इस वैश्वीकरण की नयी राजनीति और अर्थव्यवस्था पर चर्चा करना बहुत जरुरी हो गया है।

ग्रीन बुक फिल्म भी इन्हीं सच्ची घटनाओं पर आधारित एक फिल्म है जहाँ १९६२ के अमेरिका को दर्शाया गया है, लेकिन बहुत ही निपुणता और कलात्मक ढंग से। हांलाकि बराक ओबामा के राष्ट्रपति पद के आठ साल बाद भी वहां की वर्तमान परिस्थिति बहुत ही भयंकर है।

ये बात शायद ही किसी को पता हो कि विश्व के कुल २५ प्रतिशत कैदी अकेले अमेरिका के जेलों में बंद है। जी हाँ, ये हकीकत है। मैंने आपको ये आंकड़ा दुनिया के उन तमाम हज़ारों कैदियों के मुकाबले कहा है जो किसी न किसी कारण अपने-अपने देशों में सलाखों के पीछे है। क्या आपने कभी निजी जेलों और उससे होने वाले अरबों डॉलर के मुनाफे के बारे में सुना है? अमेरिका में निजी जेल उद्योग एक बहुत बड़ा क्षेत्र है और शेयर बाजार में विभिन्न निगमों द्वारा इनके शेयर स्टॉक मार्किट में खरीद-फरोख्त होता है।

इसलिए, जब मैं अपने श्रम संघ के छात्रों से पूछता हूँ कि अपने लाभ के लिए सी सी आर या जियो जेल कॉर्पोरेशन क्या बेच रहा है, तो ज़्यादातर छात्र चुप रहते है। सस्ती वाहवाही बटोरने के लिए हमारे देश के छात्रों के तरह वो कुछ भी जवाब नहीं दे देते। जिन्हे थोड़ी बहुत इस बारे में ज्ञान है वे कहते हैं: ”पार्थो (या डॉक्टर बनर्जी), मुझे लगता है कि उनका निवेश, मुनाफा कमाने का जरिया ये ब्लैक और इमिग्रेंट्स कैदी है।”

यहाँ टिप्पणी करना बेकार है। जब डॉ शर्ले को एक विश्व प्रसिद्ध पियानो वादक होने के बावजूद पुलिस और श्वेत अमेरिकियों द्वारा हमले का शिकार होना पड़ा था तो मैं किस खेत की मूली हूँ? इक्कीसवे सदी के डॉ बनर्जी को भी उसी यातना का शिकार होना पड़ सकता है क्योंकि न तो इस डॉक्टर की कोई दुनिया भर में ख्याति प्राप्त है, और न ही उसका रॉबर्ट कैनेडी जैसा कोई दोस्त है।

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पार्थो बंद्योपाध्याय

ब्रुकलिन, न्यूयॉर्क

Translation by: Moly Mukherji Gupta – Southampton, U.K

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